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शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

याद आता गुजरा हुआ ज़माना ,ज़न्नतनशी दोस्तों का मुस्कराना



याद आता है
गुजरा हुआ ज़माना
ज़न्नतनशी
दोस्तों का मुस्कराना

lलड़ना झगड़ना 
फिर गले से लगाकर 
पलकों पर बिठाना
उनके मुंह का हर लब्ज
लगता था सुना रहा है 

कोई खूबसूरत तराना
साथ गुजरे
वक़्त का हर लम्हा
अब एक अफ़साना
निरंतर याद कर के
दिल का रोना
हर दिन मन में
सवाल आना
काश कोई एक भी
वापस लौट आता
उसे हाल--दिल सुनाता
यकीन है 
हर हाल में 
वो मेरा साथ देता
गले लगा कर
मेरी तन्हाई मिटाता
मैं भी दुनिया को 
बताता
गर ज़मीन पर नहीं कोई
ज़न्नत में तो 
बसता है
मुझे चाहने वाला
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
दोस्त,जन्नतनशीं,यादें,ज़िंदगी,
286—02-2011
19-02-2011
E

क्या कवी,गेंदबाज़,बल्लेबाज़,क्षेत्र रक्षक,दर्शक सोचता, खेल जब क्रीकेट का होता


285—02-11
कवी,पाठकों से
निरंतर
मन में ख्याल आता
क्या गेंदबाज़,बल्लेबाज़,
क्षेत्र रक्षक,दर्शक सोचता
खेल जब क्रीकेट का होता
क्या मन में 
खुद से कहता
अपनी कलम से बात
उनके दिल की लिखी 
बात सच्ची या झूंठी
उन के दिल में छुपी
बल्लेबाज़,गेंदबाज़ से
मारूंगा चौका,मारूंगा छक्का
गेंद को सीमा पार
पहुंचाऊंगा
रन भाग भाग कर
भी लूंगा
तुझे सताऊंगा
हर गेंद को पूरी ताकत
से मारूंगा
अपने टीम को जिताऊंगा
गेंदबाज़,बल्लेबाज़ से
आ सामने आ
डरता डरता मैदान में आ
गेंद से खुद को बचा
विकेट को मुझ से छुपा
खेलने ना दूंगा
रफ़्तार से दहशत 
फैलाऊंगा
स्पिन से तुझे 
भरमाऊँगा
आऊट तुझे करूंगा
अपनी टीम को जिताऊंगा
क्षेत्ररक्षक,बल्लेबाज़ से
गेंद कहीं भी मार
उसे पकड़ लूंगा
गेंद को सीमा तक
जाने ना दूंगा
रन लेगा,रन आऊट
कर दूंगा
गेंद उछालेगा
कैच आऊट कर दूंगा
अपनी टीम को जिताऊंगा
दर्शक,बल्लेबाज़ से
मार दे चौका मार दे
छक्का
गेंद को सीमा पार
पहुंचा दे
गेंदबाज़  का दिल
तोड़ दे
रनों का अम्बार लगा दे
अपनी टीम को जीता दे
दर्शक,गेंदबाज़ से
गेंद ऐसे ड़ाल दे
विकेट को उखाड़ दे
बल्लेबाज़ को टिकने ना दे
हर गेंद पर विकेट ले
अपनी टीम को जीता दे
 19-02-2011

बचपन की होली कभी ना भूलती,हर होली पर याद आती

284—02-11

मैं भी 
होली खेलता था
कई दिन इंतज़ार करता
दोस्तों में चर्चा होती
कैसे खेलेंगे, 
किसे कितना रंगेंगे
रणनीती बनती
चंदे के लिए घर घर टोलियाँ
घूमती
पेड़ों की डालियाँ चोरी से
काटी जाती
पकडे जाने पर फजीहत होती
होली आती,स्कूल की छुट्टी होती
दिल में अजीब सी मस्ती होती
होली पूजी जाती,फिर जलायी जाती
रंगों की बरसात शुरू होती
थाली पकवान से भरी होती
मोहल्ले के लोगों को
खट्टी मीठी उपाधी दी जाती
रात मुश्किल से कटती
सुबह होते ही दोस्तों की
टोली बनती
गली मोहल्ले घूमती,
कभी नाचती कभी गाती
रंगों से चेहरों को छुपाती
सब एक दूजे को देख,हँसते
किस का रंग
कितने दिनों में उतरेगा
इस पर बहस होती
होली समाप्त होती
पर चर्चा कई दिन चलती
बचपन की होली कभी
ना भूलती
हर होली पर याद आती
दिल को निरंतर रोमांचित
करती
19-02-2011

क्रीकेट के खेल का महा संग्राम शुरू हुआ

283—02-11

 क्रीकेट के खेल का
महा संग्राम शुरू हुआ
गेंद बल्ले की लड़ाई का
आगाज़ हुआ
रंग बिरंगे कपड़ों में
खिलाड़ियों में जोश आया
कौन किस पर भारी
मुकाबला शुरू हुआ
चाहने वालों की नज़रें
टी वी पर गढ़ी
खेल शुरू होने के साथ
दिल की धडकनें बड़ी
जब तक मेला क्रीकेट का चलेगा
हर जगह चर्चा उसी का होगा
नए सितारों का जन्म होगा
कुछ का हव्वा कम  होगा
कौन सरताज होगा
कुछ दिनों बाद पता चलेगा
तब तक हर शख्श अंदाज़ 
अपना लगाएगा
कौन विश्व कप घर ले जाएगा
ये तो समय बताएगा
एक बात निश्चित है
देखने वालों को मज़ा आएगा
क्रीकेट के नए चहेतों का
जन्म होगा
जनता को आनंद
मीडिया को पैसा मिलेगा
गरीब फिर भी पेट के
चक्कर में घूमेगा
आज बीत गया
कल की चिंता करेगा
19-02-2011

दिल की आग कभी ना बुझती,निरंतर दिलों में गम भरती

282—02-11
ये कैसी
अजीब बस्ती है
हर तरफ आशिकी
दिलों में आग लगी

हीर रांझों से भरी

उम्मीद किसी की
पूरी ना होती
दिल की आग कभी
ना बुझती
निरंतर
दिलों में गम भरती
फिर भी
चलती रहती
रोज़ एक नए
हीर रांझा की जोड़ी
पैदा होती
19-02-2011   

ज़िन्दगी लम्बी नहीं ,गहरी होनी चाहिए

ज़िन्दगी अजीब
खेल खिलाती है
कभी रुलाती
कभी हँसाती
कभी ठहरती
कभी चलती
निरंतर 
नए रंग दिखाती है
एक पल देती
एक पल लेती
ना चुप रहती
ना रहने देती
हर दिन नया
अनुभव कराती है
किसी को नफरत
किसी को मोहब्बत
किसी को
जीने से पहले ही
हवा में उडाती है
ज़िन्दगी लम्बी नहीं
गहरी होनी चाहिए
मजबूरी में नहीं
खुशी से जीनी चाहिए
खुदा का
इंसान को तोहफा है
जैसी भी  मिली
जीनी  चाहिए


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

19-02-2011
जीवन,ज़िंदगी
281—02-11 

वो मजबूर था,काम दूजा ना था,मुर्दों के सहारे जीता

280—02-11


वो मजबूर था
काम दूजा ना था
मुर्दों के सहारे जीता 
मौत की खबर सुन 
मन में खुश होता
पर चेहरे पर भाव
ना लाता
लोग क्रोधित होंगे
इस बात से डरता
क्रिया कर्म का
सामान बेचता
जितनी मौतें
उतनी बिक्री
सदा दिमाग में 
रखता
बच्चा हो या बड़ा
फर्क ना पड़ता
भाई हो या बाप
गम ना होता
निरंतर
भण्डार भरा रखता
सामान कम ना पड़े
ध्यान रखता
मजबूरी में मौत से
पेट पालता
19-02-2011

इश्वर को भक्तों की नहीं,भक्तों को इश्वर की आवश्यकता होती


279—02-11

छोटे से
मंदिर का पुजारी 
निरंतर
 इश्वर से प्रार्थना करता
मंदिर की ख्याती 
चारो दिशाओं में फैला दे
मंदिर को भक्तों से  भर दे
मनोकामना पूरी कर दे
खूब चढ़ावा चढ़ेगा
उस का भी भला होगा
मंदिर के साथ 
उसका भी नाम होगा
पूजा का प्रसाद मिलेगा
प्रार्थना करते करते
बुढापा आ आया
इश्वर टस से मस ना हुआ
मंदिर ज्यों का त्यों रहा
पुजारी निरंतर भूलता रहा
इश्वर को भक्तों की नहीं
भक्तों को इश्वर की
आवश्यकता होती
सत्य ईमान कर्म और
खुद पर विश्वाश से 
बिना मांगे
मनोकामना पूरी होती
स्वार्थ की सदा दुर्गती
होती
©डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
19-02-2011
E

हर दिन,हर शख्श,हर मजहब,दिल से होली मनाए

278—02-11

होली आती
सवाल मन में पैदा करती
क्यों पेड़ों की कटाई होती
क्यों डालियाँ जलाई जाती
निरंतर बाँझ हो रही धरती
की क्यों हंसी उडाई जाती
प्यार भाई चारे की मिसाल
मानी जाती
मगर रंगों में मिलावट होती
जबरदस्ती चन्दा उगाही
की जाती
ज़िन्दगी बदरंग पर
होली रंगों से खेली जाती
भांग ,शराब खूब चढ़ाई जाती
नशे को तरजीह दी जाती
नहीं खेले तो,
जबरदस्ती खिलाई जाती
खूब मार पिटाई होती
दीवारें गंदी करी जाती
अश्लीलत़ा खुल कर दिखाई जाती
क्यों ना रीत बदल दें
बिना पेड़ काटे
होली जलाएँ
निरंतर रंग जीवन में 
भर दें
ना दीवारें गंदी हों
ना ज़बरदस्ती हो
होली की कोई तिथी तारीख ना हो  
हर दिन,हर शख्श,हर मजहब
दिल से होली मनाए

नए रंगों से उसे सजाएँ

19-02-2011

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

अब पैमाना बदल दो,पैसे से लोगों को मत तोलो

277—02-11


अब
पैमाना बदल दो
पैसे से लोगों को मत तोलो
कैसे कमाया ये भी जान लो
पैसे वालों के पीछे घूमना बंद करो
मेहनत ईमान,और ज्ञान को
पैसे से बढ़ कर मानों
आज है,कल नहीं ये भी जानों
ईमान ज्ञान मेहनत
इंसान को निरंतर आगे बढाते
संतुष्टी मन को देते
चैन से सोना है
तो होड़ छोड़ दो   
पैसे को सब कुछ मत मानों
चार बीमारी पालनी हो
दिन रात भागना हो
बेचैन और असंतुष्ट रहना हो
असुन्तुष्ट मरना हो
तो पैसे को सब कुछ
मानों
18-02-2011

लोग खुद से विश्वाश खो चुके,अब किसी पर विश्वाश नहीं करते

276—02-11


पेड़ों की पत्तियाँ
झडती नयी कोपलें निकलती
सब खुश होते
पेड़ में बदलाव को स्वीकार करते
घर की दीवारें गंदी होती
टूटती फूटती
उनकी मरम्मत होती
नए रंग से रंगी जाती 
सब खुश होते 
बदलाव को स्वीकार करते
चूल्हे पर चढ़ कर
कढाई काली होती मांजी जाती
सब खुश होते
बदलाव को स्वीकार करते
कई बार असफल हुआ
मेहनत से सफल हुआ
लोग बदलाव को स्वीकार
नहीं करते 
निरंतर क्रोध घ्रणा को
दूर करता
शब्दों को सोच कर बोलता
बदलने की  कोशिश करता
लोग विश्वाश नहीं करते
बदलाव को स्वीकार
नहीं करते
लोग खुद से विश्वाश
खो चुके
अब किसी पर विश्वाश
नहीं करते
ना बदलते
ना किसी इंसान में
बदलाव की उम्मीद करते
कोई बदलना भी चाहे, 
तो पीछे धकेलते
बदलाव को स्वीकार
नहीं करते
हर शख्श को
खुद जैसा देखना चाहते
18-02-2011

अब दिल-ऐ-दुश्मन हो गए हैं

275—02-11


पहले 
रोज़ मिलते थे
अब ख्वाबों में भी
मुंह फिराते हैं
हर बात को
गौर से सुनते थे
अब कुछ कहने का
मौक़ा भी ना देते हैं
निरंतर इंतज़ार करते थे
अब रोज़ इंतज़ार कराते हैं
मोहब्बत मुझ से करते थे
अब नफरत जहन में
रखते हैं
सुकून दिल को देते थे
अब दिल-ऐ-दुश्मन
हो गए हैं
18-02-2011

चुप रहते हो,कुछ ना कहते हो

274—02-11


चुप रहते हो
कुछ ना कहते हो
ग़मों को ढ़ोते हो
उफ़ ना करते हो
हँसते दिखते हो
मन में रोते हो
बेचैन रहते हो
रात भर जागते हो
खामोशी से सहते हो
शिकवा,
 शिकायत कभी
ना करते हो
मोहब्बत करते हो
मुंह से ना कहते हो 
दुनिया से डरते हो
अब सच बता दो
दिल की बात
जुबां से निकालो
निरंतर जल रही
आग को बुझा दो
18-02-2011

ज़मीं पर खून निरंतर बह रहा,रंग रोज़ गहरा हो रहा

273—02-11

ज़मीं पर
खून निरंतर बह रहा
रंग रोज़ गहरा हो रहा
इंसानों की बस्ती में
मौत का मंजर अब
आम हो रहा
ज़िन्दगी काटना
मुश्किल हो रहा
मर मर कर जीना
ज़रूरी हो रहा
सोना अब दुश्वार
हो रहा
जागना मजबूरी
हो रहा
कब कातिल काम
अपना करेगा
पता लगाना नामुमकिन
हो गया
पैदा होने पर लोग
खुशी मनाते
अब  ज़िंदा रहने
के तरीके ढूंढते
नफरत के खंजर से
बचने के नुस्खे
पूंछते
18-02-2011

कभी हैवान कभी खुदा बनते

272—02-11
बड़ी आसानी से
आँख चुराते
नहीं मिलने के 
बहाने ढूंढते
वादा तोड़ने में 
गुरेज ना करते 
चेहरे पर शिकन
ना लाते
शिकायत हंस कर 
टाल देते 
मासूमी से माफी
मांग लेते
निरंतर वो ही 
दिल तोड़ते
मलहम   भी वो ही
लगाते
कभी हैवान कभी 
खुदा बनते
18-02-2011