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शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

मौसम बदला पतझड़ आया

246—01-11


मौसम बदला
पतझड़ आया
तेज हवाओं का चलना
पत्त्तों का गिरना
प्रारम्भ  हुआ
पीले पड़ चुके पत्तों का
वृक्ष से गिरना
ज़मीन में दफ़न होना
शुरू हुआ
वृक्ष का कलेवर
बदल गया
अपनों से बिछड़ गया
माहौल गमगीन हुआ
पंछी उड़ गए
घोंसले खाली हो गए
एक युग समाप्त हुआ
नए युग का उद्भव हुआ
कोपलें फूटने लगी
पत्तियों में
बदलने लगी
वृक्ष की
रौनक लौटने लगी
वृक्ष फिर हरा हुआ
नया रंग रूप लिया
पंछी बैठने लगे,
घोंसले बनाने लगे
चहचाहट से
नए युग का
स्वागत किया
कलियों का जन्म हुआ
फूलों की आशा में
मौसम भी
खुशगवार हुआ
नया युग आया
निरंतर युग
बदलता रहता है
नया आता,
पीला पड़ता है
लौट जाता
जीवन का क्रम
यूँ ही चलता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन.वृक्ष,फूल,मौसम
11-02-2011

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

तुम नज़र आते तो ,फूलों को कौन देखता

245—01-11

जब तुम
नज़र आती हो
फूलों को
कौन देखता है
तुम्हारे नूर से
फूलों का
क्या मुकाबला
तुम्हारे होते हुए
बहारों को
कौन जानता
जब भी देखो
बसंत का
अहसास होता है
रंग हर फूल भी
फीका लगता है
तुम बोलती हो तो
संगीत कौन सुनता
तुम हँसती हो
हर साज़
बेसुरा लगता है
आँखों के आगे
मृग भी नैन झुकाता
चाल के आगे
हिरनी का
चलना रुक जाता
जो तुम्हें देखता
खुदा को
कहाँ याद करता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
11-02-2011
 

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

सागर में चाँद का अक्स,तेरे कानों के झुमके सा लगता

सागर में
चाँद का अक्स
तेरे कानों के 
झुमके सा लगता
लहरों के साथ 
वो भी लहराता 
तेरा चेहरा परी के 
चेहरे सा दिखता
मुस्कान से अहसास
खिले फूल का होता
नाक नक्श 
किसी कलाकार का 
हूनर लगता 
तेरा अंदाज़ 
हर दिल को लुभाता
हँसना किसी साज़ का
सुर लगता
आवाज़ से समाँ
संगीत का बनता
तेरे हर रूप में 
मुझे खुदा दिखता
हर रूप तेरे सामने 
शर्मिन्दा होता
हर कद्र दान
तुझको दिल दे देता
ख़्वाबों में 
सिर्फ तुझे देखता
ख्यालों में सिर्फ
तुझ को रखता

डा.राजेंद्र  तेला,निरंतर
१०-०२-२०११
244—01-11 
सुंदरता,ख़ूबसूरती,प्यार,मोहब्बत 

E

दबा रखा है,मन में उठते तूफानों को


दब रखे हैं 
मन में उठते 
तूफानों को
खामोश कर रखा है 
दिल की धडकनों को
ना तारीफ़ में तेरी
मुंह खोलता हूँ 
ना दिल में कोई
गिला रखता हूँ 
खामोशी से सब
सहता हूँ 
चुप चाप तुझे 
देखता हूँ 
तूँ सलामत रहे 
तेरा नूर बना रहे 
निरंतर खुदा से 
दुआ करता हूँ
10-02-2011
244—01-11

डा.राजेंद्र  तेला,निरंतर 

जोग संजोग किसने देखा,हो जाए तो जोग,ना हो तो संजोग

243—01-11
 
जोग
संजोग किसने देखा
हो जाए तो जोग
ना हो तो संजोग
किस्मत को किसने देखा
किसने खुदा को देखा
हर शख्श ने
अपनी अक्लसे सोचा
हर बात को
अपनी नज़र से देखा
मीठी बातों में फंसते
लोग
कड़वा सच कहाँ सुनते
 लोग
निरंतर कयास अपना
लगाते
जो भाता उसे अच्छा
बताते
ना पसंद को बकवास
कहते
हकीकत से खुद को
दूर रखते
10-02-2011

उन लम्हों की खातिर तो बोलो,मिलो तो मुस्करा कर मिलो

242—01-11

यूँ न मिलो
जैसे ख़फ़ा हो मुझसे
दिल की बात बताओ
जो कह रहा मन वो
कह दो
लोग क्या कहेंगे ये
ना सोचो
मत सियो लबों को,
चाहे तो ख़्वाबों में
आवाज़ दो
सुन कर भी चुप रहूँगा
दिल नहीं दुखाऊंगा
निरंतर
ख्याल रखा तुम्हारा
हर लम्हा साथ गुजारा
उन लम्हों की खातिर
तो बोलो
मिलो तो मुस्करा तो
कर मिलो

10-02-2011     

कदम इंसान के क्यों भटकते

241—01-11

कदम
इंसान के क्यों
भटकते
चलते चलते डगर
बदलते
क्यों अपनी मंजिल
भूलते
ज़न्नत का रास्ता,
हैवानियत से ढूंढते
निरंतर  ईमान खोते
बेईमानी गले लगाते
ज़मीर अपना बेचते
खिजा में बहार ढूंढते
दिखाने को पूजा करते
काम उलटा करते
ना खुदा से डरते
ना उस में विश्वाश
रखते
रास्ता दोजख का
लेते
ऊपर भी जाना है
उसको जवाब देना है
क्यों भूलते ?
10-02-2011

आज कल वो मिलती नहीं,कहाँ रहती पता नहीं

240—01-11


आज कल
वो मिलती नहीं
कहाँ रहती पता नहीं
कहीं दिखती नहीं
ख्याल उनका रुकता
नहीं
भूल उनको सकता
नहीं
उनका जलाया चिराग
बुझता नहीं
रोशनी कम होती नहीं
याद मिटती नहीं
निरंतर सूरत सामने
रहती
ज़मीं पर नहीं,
ज़न्नत में दिखेगी
उम्मीद अभी मरी
नहीं
1-02-2011

पहले कोई राजा,कोई रंक होता

239—01-11



पहले कोई राजा
कोई रंक होता 
निरंतर
सफ़र दोनों का 
एक जगह समाप्त
होता
मुकाम दोनों का
एक होता
सवारी इक सार
होती
शैया बांस,मूंज की
होती
दोनों सहारा कंधे का
लेते
शमशान में एक
जगह लेटते
लकड़ी की शय्या
पर सोते
उसी तरह जलाए
जाते
उसी तरह राख
होते
10-02-2011