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शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

आग दिल में लगी,मन में मिलने की ख्वाइश बसी

214--02-11


आग दिल में लगी
मन में मिलने की
ख्वाइश बसी
अचानक आंधी कैसी आयी?
ग़मों की बारिश ने  
आग दिल की बुझाई
 राख उसे बनायी
तड़प अधूरी रह गयी
निरंतर जो दिल में थी 
हसरत मेरी
पूरी होने से पहले
मिटाई
अब किस से अफ़साना 
अपना कहूं?
कैसे दिल पर काबू रखूँ
कैसे उसे समझाऊँ
दुआ ही बची अब
पास मेरे
सहारा उसे अपना
बनाऊँ
05-02-2011

अब ऊंची कुर्सी पर बैठ गए

213--02-11

अब ऊंची
 कुर्सी पर बैठ गए
पहले वकील थे, 
अब ज़ज़ हो गए
पहले मुवक्किल को 
ग्राहक समझते
तारीख पर तारीख लेते
हर तारीख पर फीस लेते
अब समय सीमा में
 बांधते
05-02-2011
(हर पेशे में काली भेडें होती हैं, यह रचना  वकालत के पेशे के, केवल एक पक्ष को उजगार करती है ,किसी की भावना को ठेस पहुंचाना या वकालत और न्याय व्यवस्था पर आक्षेप लगाना कदापि उद्देश्य नहीं है .क्षमा प्रार्थी हूँ अगर किसी को पढ़ कर कष्ट हुआ हो.कृपया दिल से ना लगाएं )

निरंतर आसमान को देखता हूँ,उस में रहने वाले को ढूंढता हूँ


212--02-11

निरंतरआसमान को
देखता हूँ
उस में रहने वाले को
ढूंढता हूँ
दिख जाए तो सवाल
उस से पूछूं
क्यूं चेहरा इंसान से
छुपाता है?  
क्या इंसान से डरता है?
उस की फितरत से
घबराता है?
उस की नफरत से
नफरत करता है?
सवाल का जवाब
देना होगा
फर्क इंसान और खुदा में
बताना होगा
सही रास्ता दिखाना
होगा
नहीं तो इक दिन
तुम्हें भी इंसान सा
जीना होगा
05-02-2011

कब तक सवाल करोगे?

211--02-11
कब तक
सवाल करोगे?
"निरंतर"जवाब
मांगोगे
मेरे हर जवाब पर
फिर सवाल करोगे
कब तक सबूत
बेगुनाही का मांगोगे
यकीन मेरी बात
पर करोगे
मुझे भी जीने
दोगे
05-02-2011

दो बूँद आँसूं की आँखों से निकली, बात मन की बाहर निकली

210--02-11

दो बूँद
आँसूं की आँखों से
निकली
बात मन की बाहर
निकली
 दिल की पीड़ा
लोगों को पता चली
निरंतर छुपी थी
अब आम हो गयी 
शहर में चर्चा का
दौर चलेगा
हर शख्श मतलब
अलग निकालेगा
निरंतर सवाल करेगा
बूंदों की जगह
आंसूंओं का झरना
बहेगा
गम और बढेगा
कौन इस बात को
समझता
हर शख्श हमदर्दी
दिखाता
ज़ख्मों में इजाफा
करता
05-02-2011

गम सहना अब आदत बन गया, हिस्सा ज़िन्दगी का हो गया

209--02-11


गम सहना अब
आदत बन गया
ज़िन्दगी का हिस्सा
हो गया
बार बार ठुकराया
गया
"निरंतर"ज़ख्म खाता
गया
अब दर्द भी नहीं
होता
ना मलहम काम
करता
दिन बिना चोट गुजरता
ऐतबार दिल को
ना होता
इंतज़ार रात का
करता
जो रह गया दिन में
रात को हो जाए
ख्वाइश लोगों की
पूरी हो जाए
दिल-औ-जिस्म पत्थर
हो गए
जीने के मायने बदल
गए
आँख मुन्देगी सो
जाएँगे
ज़ख्म तब तक खाते
जाएँगे
गम यूँ ही सहते
जाएँगे
05-02-2011

काव्यात्मक लघु कथा- सब हँसे इसलिए हँस दिया

काव्यात्मक लघु कथा- सब हँसे इसलिए हँस दिया
=================================
मास्टरजी ने
गलत उच्चारण किया
वाक्य का अर्थ
बदल गया
छात्रों ने जोर का
ठहाका लगाया
मित्र से मिलने के
इंतज़ार में
कक्षा के बाहर खड़े
बालक ने भी
जोर का ठहाका लगाया
मास्टरजी को क्रोध आया
कोई मज़ाक बनाए
बर्दाश्त ना हुआ
बाहर जा कर
उसे चांटा लगाया
वो सिसकियाँ ले कर
रोता रहा
प्रधानाध्यापक का
उधर से गुजरना हुआ
बालक से
रोने का कारण पूछा
सिसकते सिसकते
इशारे से समझाया
गूंगा बहरा हूँ
ना सुन सकता हूँ
ना बोल सकता हूँ
सब हँसे
इसलिए मैं हँस दिया
इश्वर ने क्यूं
अत्याचार किया
निरंतर उसे गलत
समझा जाता है
बार बार जलील
होना पड़ता है
क्यों उस के दर्द को
कोई नहीं समझता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
05-02-2011
208--02-11
गूंगा बहरा,व्यथा,काव्यात्मक लघु कथा

कर्तव्य


207--02-11

जेठ की दोपहर
सूरज अपने यौवन पर
दुर्बल वृद्ध रिक्शे पर 
सवारियों का बोझ 
ढोते ढोते
पसीने से लथ पथ 
थकान से हांफ रहा था  
सवारी से रहा ना गया
वृद्ध से प्रश्न किया
क्यों  कृशकाय
शरीर को कष्ट देते हो 
मरने का काम करते हो 
कोई और काम करो
वृद्ध ने उत्तर दिया 
बूढ़ी माँ का अकेला
सहारा हूँ 
उसका पेट पालना है 
किसी तरह जीवन
चलाना है 
उसके खातिर जीना है 
उसके जाने के साथ
मुझे भी जाना है 
तब तक,मर मर कर
जीना है 
पुत्र का कर्तव्य 
निभाना है 
05-02-2011

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

निरंतर" बना रहे मंज़र मिलन का,दुआ खुदा से कर रहे

206--02-11
ना वो बोल रहे
ना मैं बोल रहा
दोनों एक दूजे को
देख रहे
ना उन्हें यकीन
ना मुझे यकीन
दोनों सोच रहे
गैर मुमकिन को
मुमकिन होते 
देख रहे
"निरंतर" बना रहे
मंज़र मिलन का
 दुआ खुदा से
कर रहे
04-02-2011

दिल महक गया उनके आने की खबर से


205--02-11

दिल महक गया
उनके आने की खबर से
पैगाम जब आया
उनके ख़त से
जो अब तक ना था
चैन से
हो रहा था परेशान
खबर ना आने  से
देखता था दरवाज़ा
बार बार बेचैनी से
खुदा से दुआ करता था
नम आँखों से
झूम कर नाचने लगा
उनके आने की खबर से
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मोहब्बत,खबर ,शायरी, 
04-02-2011  

तुम ना आ सको तो मुझे अपना लिबास ही भिजवा दो

तुम ना आ सको तो
अपना लिबास ही
भिजवा दो
तुमसे लिपट कर रहा
वो खुश किस्मत
भिजवा दो
उसने सूंघी महक तुम्हारी
हर घड़ी
तुम्हारे साथ गुजारी
खामोशी से
हर बात सुनी तुम्हारी
निरंतर
पहचान बना तुम्हारी
हम साया
बन कर ज़िंदगी गुजारी
उसे देख कर तुम्हें
अपनी करीब पाऊंगा
उसमें ज़ज़्ब
तुम्हारी खुशबू सूंघ कर
वक़्त काटता रहूँगा
तुम्हारे  आने का
इंतज़ार करता रहूँगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मोहब्बत,खुशबू,शायरी,

04-02-2011
204--02-11
मोहब्बत,शायरी,प्यार,इंतज़ार,लिबास,यादें ,याद

सफ़र ज़िन्दगी का,शुरू बाबुल से होता,ख़त्म पिया संग होता

203--02-11


बाबुल
का घर छूट गया
बचपन पीछे रह गया
प्रीतम से मिलना हुआ
कैसा मुकाम ज़िन्दगी
में आया
दिल टुकड़ों में बट गया
एक मिल गया,
दूजा छूट गया
याद बाबुल की सताती
पीया संग भूल जाती
पीया बाहर जाते
व्याकुल हो जाती
कभी पीया,कभी बाबुल
निरंतर याद करती
ख़त बाबुल का मिलता
मन खुशी से पागल
होता
पीया को कम भाता
कैसे समझाऊँ उन्हें ?
कैसे बताऊँ उन्हें ?
दिल दोनों जगह
अटका
सफ़र ज़िन्दगी का
शुरू बाबुल से होता
ख़त्म पिया संग
होता
04-02-2011

मैं अब हैरान नहीं होता,हर खबर सहजता से लेता

202--02-11


मैं अब
हैरान नहीं होता
हर खबर सहजता
से लेता
कत्ल की ख़बरों से
डर नहीं लगता
घोटाले के समाचारों से
आश्चर्य नहीं होता
दुर्घटनाएं व्यथित नहीं
करती
सिर्फ समाचार पत्रों
टी वी चैनलों से
घबराता हूँ
वही पढ़ना पडेगा
वही देखना पडेगा
उस से व्यथित होता हूँ
"निरंतर"कमाई के लिए
चटखारे ले कर ख़बरों को
पढने,सुनने से सहमता हूँ
अब सुकून से रहना
चाहता हूँ
बिना ख़बरों के जीना
चाहता हूँ
04-02-2011

काव्यात्मक लघु कथा--ना मार खाता,ना भीख माँगता,अब लूट मार करता



काव्यात्मक लघु कथा--ना मार खाता,ना भीख माँगता,अब लूट मार करता
===================================================
वो करीब
आठ साल का था
मैले कुचले,फटे पुराने,
कपडे पहने  
दिन भर भीख माँगता
शाम को घर लौटता
बाप बेसब्री से इंतज़ार करता
पैसे छीनता,शराबखाने जाता
जल्दी से कुछ घूँट चढ़ाता
खाने को कुछ खरीदता
घर लौटता
थोड़ा बेटे को देता,
बाकी खुद खाता
बेटा और माँगता 
गाली से स्वागत करता
एक थप्पड़ लगाता
सो जाता
बच्चा रोता रहता
थक जाता
आँख लगती फिर सो जाता
सुबह बाप से पहले उठता
भूखे पेट घर से निकलता
दिन भर भीख माँगता
लोगों की गालियाँ सुनता
मार खाता
जो मिलता खा लेता
पैसे जेब में रखता
शाम को फिर घर लौटता
"निरंतर"यही क्रम चलता
धीरे धीरे समझने लगता
अपराध की दुनिया में
कदम रखता
ना डरता,ना भूखा रहता
ना मार खाता,
ना भीख माँगता
अब लूट मार करता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
04-02-2011 
201--02-11

दुनिया अब बेनूर लगती,बिना तुम्हारे सूनी लगती



दुनिया अब बेनूर लगती
बिना तुम्हारे सूनी लगती
ज़िन्दगी अब बोझ लगती
जीने की ख्वाहिश नहीं होती 
मिलने की हसरत बढ़ी
तमन्ना सिर्फ एक बची
ज़न्नत में पूरी होगी
मुलाक़ात अब वहीँ होगी
ज़िन्दगी फिर शुरू होगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
04-02-2011
200--02-11

कल तक अपने थे आज पराए हुए


कल तक अपने थे
आज पराए हुए
पुराने अफ़साने 
फिर दोहराए गए
वफ़ा का सिला
बेवफाई से दे गए
अच्छा हुआ
जो मेरे साथ हुआ
किसी और के 
साथ होता तो 
शहर भर में 
तज़किरा होता
वो बदनाम होते
लोग हकीकत से 
वाकिफ होते
उन्हें भला बुरा कहते
हमें तो आदत है
कई बार ठुकराए गए
निरंतर ज़ख्म खाए
इस बार भी खा लेंगे
चुपचाप सह लेंगे
फिर कोई मिलेगा
उस को अपना लेंगे 
जब तक रखेगा
साथ रह लेंगे
जब निकालेगा
निकल जाएँगे
तज़किरा=चर्चा 
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर
04-02-2011
198--02-11
तजकिरा,बेवफाई,हकीकत,अपने,पराये,शायरी,selected 

अब वो अकेला ना था, भीड़ से घिरा था


अब वो
अकेला ना था 
भीड़ से घिरा था 
बांस की
शय्या पर लेटा था 
नयी चादर ओढ़े था 
सबकी आँखों में 
आंसू थे
उसकी मौत पर 
शोक जता रहे थे
वो एक भिखारी था 
आज के पहले 
अकेला था 
बेबस बीमार था 
भीख मांग कर 
पेट पालता था 
तरसती आँखों से 
आने जाने वालों को 
देखता था 
कोई सहारा दे दे
कुछ पल साथ बिता दे  
आशा में ज़िंदा था 
ट्रक से कुचला गया 
आज प्राणांत हुआ 
दुखों का पटाक्षेप हुआ
अब वो 
अकेला ना था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
04-02-2011
199--02-11
जीवन,मौत,भिखारी  

इक बार नज़र उठा कर देख ले,नज़र से नज़र मिला ले

197--02-11

इक बार
नज़र उठा कर देख ले
नज़र से नज़र मिला ले
मोहब्बत मुझ से
करते हो
यकीन मुझे दिला दे
फिर चाहे जान
मेरी ले ले
या गम-ऐ-दिल बता दे
तेरे गम मुझे दे दे
तेरे चेहरे पर खुदा 
हंसी दे दे
रौनक उस की बढ़ा दे
गम से राहत दे दे 
दुआ खुदा से करूंगा 
हर वक़्त तुझे
मुस्कराता देखूं
हर लम्हां चहकता
देखूं
महक से तेरी
जहाँ को मदहोश 
होते देखूं
ख्वाब में तुझे देखूं
निरंतरखुदा तुझे
समझूं
इबादत तेरी करूँ
तेरे खातिर वजूद 
अपना मिटा दूं
04-02-2011  

क्यूं लोग दिल से निकाले जाते

196--02-11
ना जाने 
क्यूं लोग दिल से
निकाले जाते हैं
बेरुखी से

ठुकराए जाते हैं
घर से बेघर

किये जाते हैं
गम में

बादाखाना जाते हैं
भर भर पैमाना

शराब पीते हैं
गम दूर करते हैं
खामोश  से

बेवफाई सहते हैं
फिर भी मोहब्बत

करते रहते हैं
उन्हें बदनाम

नहीं करते
ज़माने को कसूर

अपना बताते हैं
04-02-2011
बादाखाना = शराब खाना,मयखाना 

कढाई ज़िन्दगी की उबलती रहती ,कभी धूप कभी छाँव होती

195--02-11


कढाई ज़िन्दगी की
उबलती रहती
कभी धूप कभी छाँव
होती
कभी मुस्कान चेहरे पर
कभी शक्ल रुआंसी
होती
ज़िन्दगी रंग अपने
बदलती
कभी ठहरती,थोड़ा सा
रुकती
फिर पहिये से चलती
रहती
कभी तेज़ कभी धीरे
गुडकती
मैं पहिये के कीले सा
साथ घूमता
कभी हंसता,कभी रोता
कभी सोता,कभी जागता
निरंतर इंतज़ार
उबाल ठंडा होने का
करता
जीवन सफ़र कब
रुकेगा
"निरंतर"सोचता रहता
04-02-2011

एक माँ ने बेटा खोया,सुहाग पत्नी का उजड़ा

194--02-11

एक माँ ने बेटा खोया
सुहाग पत्नी का उजड़ा
परिवार पिता विहीन हुआ
नवजात खिलने से
पहले मुरझाया
एक और विस्फोट हुआ
कई ज़िन्दगीयों का
अंत हुआ
आंतक वाद ने रंग
अपना दिखाया
तंग सोच वालों ने
काम अपना किया
इंसानियत को शर्मसार
किया
जहन में जहर भरा
दुनिया को बताया
क्यों भूल गए जाते
उनके भी भाई बहन हैं
वो भी किसी के भाई,बाप हैं
कैसा अहसास
उनके अपनों को होता होगा
जब उन का कोई मारा जाता
चेहरा उसका 
सामने आता होगा
दिल उनका भी रोता होगा
क्यूं काम ऐसा करते
"निरंतर"नफरत से जीते
खुदा के बनाए उसूलों को
खुदा के नाम पर तोड़ते
उन्हें भी ऊपर जाना होगा
जवाब खुदा को देना होगा
कैसे उसके कहर से बचोगे
वक़्त रहते बदल जाओ
रास्ता दोजख का छोडो
आंतक वाद से
तौबा कर लो
खुद जीओ औरों को
जीने दो
04-02-2011

मैं कातिल बनना चाहता हूँ


मैं कातिल
बनना चाहता हूँ
नफरत और अहम् का
क़त्ल करना चाहता हूँ
इन्हें जड़ से मिटाना
चाहता हूँ
फख्र से कह सकूं
नफरत और अहम् का
कातिल हूँ
ऐसा नाम चाहता हूँ
प्यार भाई चारे से 
जीना चाहता हूँ 
निरंतर हँसना हँसाना 
चाहता हूँ
चेहरों से आंसूओं को 
पोंछना चाहता हूँ
सब को गले
लगाना चाहता हूँ
परमात्मा से
प्रार्थना करता हूँ
मेरी प्रार्थना सुन ले 
मेरी इच्छा पूरी कर दे 
नफरत की जडें काट सकूं 
ऐसा खंजर हाथ में दे दे
कल सूर्य के ताप में
नरमी आए
सुबह नए कलेवर में आए
ऐसी सुबह दे दे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,नफरत,मोहब्बत ,कातिल,परमात्मा ,प्रार्थना 
04-02-2011
191--02-11