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शनिवार, 29 जनवरी 2011

क्यों ज़ख्मों पर मलहम लगाया?क्यों मीठा बोल मुझे फंसाया?



 क्यों 
ज़ख्मों पर मलहम 
लगाया
क्यों मीठा बोल
मुझे फंसाया
ज़ख्म और खा सकूं
इस लायक बनाया
इस से तो बेहतर
होता
अकेले छोड़ दिया
 होता
बार बार दिल ना
टूटता
यकीन मोहब्बत से
ना उठता
निरंतर सिला यकीन का
जिसे भी ऐसा मिलेगा
ज़न्नत में भी मोहब्बत
ना करेगा
नाम कभी उस का
ना लेगा
नाम लेने वाले को
चुप करेगा
दिन रात नफरत से
जिएगा
ज़ख्म वो भी
किसी और को
देगा
29-01-2011

उनसे तकरार क्या हुई,ज़िन्दगी ज़हर हो गई



उनसे
तकरार क्या हुई
ज़िन्दगी ज़हर 
हो गई
खता क्या ऐसी 
हुई
बात दिल तक 
पहुँच गई
नाम से  नफरत 
हो गई
महफ़िल अब
उजाड़ हुई
साजों में  जंक 
लग गई
बहार खिजा में 
बदल गई
तरीका कोई बता 
दे मुझे
लफ्ज वापस लेना
सिखा दे मुझे
जो मैंने कहा वापस
कह दे मुझे
दोजख से मुक्ती 
दिला दे मुझे
निरंतर जुबान को
लगाम दूंगा
बोलने से पहले
सोचूंगा 
लफ्जों को  तोल कर
बोलूंगा
चुप चाप रह लूंगा
जो कहो कर लूंगा 
मगर दूर ना रहूँगा
तुम से
29-01-2011

मोहब्बत का नाम तो ज़िंदा रहने दो




मन मेरा ना मानता
दिल तुम्हारा भी जानता 
मेरी कमजोरी हो तुम
मेरे लिए ज़रूरी हो तुम
मेरी सुबह-ओ-शाम  
तुम्हारे नाम से होती
हर वक़्त तुम जहन में रहती
मेरी चाहत को मोहरा 
ना बनाओ 
दिल को ज़ख्मों से ना नवाजो  
ना मिलो तो कोई बात नहीं
ना चाहो तो भी कोई 
बात नहीं
मगर मेरी मोहब्बत का 
मखौल तो ना उडाओ  
इंसानियत के नाते ही सही
एक बार तुम्हारा दीदार तो
करने दो 
मोहब्बत का नाम तो 
ज़िंदा रहने दो 
29-01-2011
शायरी,चाहत,मोहब्बत
E

डाली वही झुकती,जो फलों से लदी हो


डाली वही झुकती
जो फलों से लदी हो
ज़िन्दगी वही अच्छी
जिसने तकलीफ सही हो
इंसान वही जिसमें
इंसानियत बसी हो
चिराग वही रोशनी  देता
जिस का तेल जलता
प्यार वही लुटाता
जिसका दिल  प्यार से
भरा होता
भाईचारे से वही रहता
जो इंसानियत को
आवश्यक समझता
परमात्मा को
मानने वाला ही जानता
लेने के साथ देना भी
ज़रूरी होता
स्वर्ग में वही जाता
जो नर्क के कर्म
धरती पर नहीं करता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
29-01-2011
Edited on 25-1-२०१२

दिल की बात बताना,आफत हो गया



मेरे
मित्र थे
पहले निरंतर मिलते
बातें दिल की करते 
फिर कुछ ऐसा हुआ
मिलना बंद हुआ
मन अब भी मिलने
का करता 
निरंतर बेचैन रहता
अपराध बोध में जीता
कारण बताना चाहता
हिम्मत ना जुटा पाता
फिर रहा ना गया
ख़त के जरिये कारण
बताया
जवाब का इंतज़ार
किया
लंबा अरसा हो गया
जवाब ना आया
मन अब ज्यादा
बेचैन रहता
अपराध बोध में जीता
क्यों जवाब नहीं आया
निरंतर सोचता
दिल की बात बताना
आफत हो गया
पहले से ज्यादा परेशान
हो गया
29-01-2011

उनके नाम से सिहरन होती,कई यादें ताजी होती



उनके 
नाम से सिहरन होती 
कई यादें ताजी हो जाता 
मैं उन्हें,वे मुझे भाती 
जब भी मिलते 
आँखों में चमक आती 
मैं उन्हें,वे मुझे छेड़ती 
बिना मिले 
तड़प मन में होती 
ख्यालों में आती रहती 
लोगों को खटकना
शुरू हुआ 
मकसद मिलने का
कुछ और समझा गया
मुझे चर्चा का 
पता चल गया 
लोगों के मन में
क्या चल रहा समझ गया 
मिलना जुलना कम
किया 
कई बार पूछा उन्होंने 
हँस  कर टाल गया 
कारण कभी ना बताया 
अब मिलना बंद हो गया 
रंज दिल में रह गया 
क्यूं झूंठ का पर्दाफ़ाश
नहीं किया? 
बहन भाई के रिश्ते को 
बदनाम होने दिया 
क्यों सत्य के लिए
लड़ने वाला कमजोर
पड़ गया
निरंतर दिल कचोटता
कैसे उन्हें बताऊँ
हकीकत से रूबरू
कराऊँ
29-01-2011

हँसमुखजी ४५ के थे,पत्नी सुख से वंचित थे

हंसमुखजी ४५ के थे
पत्नी सुख से वंचित थे
अरमान अधूरे थे
विवाह सम्मलेन की खबर सुनी
बांछें खिल गई
सावले रंग को मेकअप में,
भेंगी आँख को, काले चश्मे में
हाथ के दाद को 

दस्ताने पहनकर छुपाया
बाल कम थे,चाँद नज़र नहीं आए
इस लिए सैलून में सैट कराए
ज़रा लंगडाते थे
पता नहीं पड़े इसलिए
दोस्त के कंधे पर हाथ रख
बन ठन कर सम्मलेन में
पहुँच गए
इंतज़ार करने लगे
कोई उन्हें भी पसंद करेगा
विवाह की बात चलाएगा
शाम होते होते प्रस्ताव आया
नाम पता पुछवाया
फिर बात चीत का बुलावा आया
उनके मन में उबाल आया
बात बन जाएगी ख्याल आया
दिल बाग़ बाग़ हुआ
सामना कन्या के बाप से हुआ
फौरन एक सवाल आया
अब तक कुंवारा क्यूं रह गया?
हंसमुख जी ने तुतलाकर
धीरे धीरे हकलाकर, 

जवाब दिया
अब तक कोई प्रस्ताव
समझ नहीं आया
कन्या के बाप ने जवाब दिया
मुझे समझ आ गया
किस्मत के मारे हो,
सब से न्यारे हो
तुतलाते, हकलाते को
प्रस्ताव कौन देगा
हम ही बेवकूफ थे
जो पैकिंग देख कर
मोहित हो गए
माल का पता होता,
तो गलती नहीं करते
नहला धुला कर,
ठोक बजा कर परखते
बोल,चाल,चेहरा,बाल
सब बारीकी से देखते
हकीकत जानते
हंसमुख जी का मुंह
उतर गया
दिल टूट गया
निरंतर ऐसा ही होता था
कभी गंजापन आड़े आता
कभी भेंगापन काम बिगाड़ता
अब भी हिम्मत नहीं हारी
दिल में आस बाकी है
एक और सम्मलेन की
खबर आयी है
अब उसकी तैय्यारी है
29-01-2011

कहीं सुन लिया उन्होंने,पत्थर में भी भगवान् होते हैं

किसी से 
सुन लिया उन्होंने
पत्थर में भगवान् होते हैं
लोग पत्थर को भी पूजते हैं
मन में बिठा लिया
वही अंदाज़ बना लिया
हँसना बोलना बंद कर दिया 
चेहरा पत्थर का बना लिया
व्यवहार रूखा कर लिया 
अपनों से किनारा कर लिया 
अब इंतज़ार में रहते हैं
लोग उन्हें पूजेंगे
कोई बता दे उन्हें 
वो सपनों में जीते हैं
भगवान पत्थर में नहीं 
हृदय में बसते है
पूजने से नहीं 
मनुष्य बन कर 
जीने से मिलते है  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
29-01-2011
भगवान,जीवन,selected

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

चाहत में खुद को मिटा दूं,उस से बड़ी इबादत नहीं


या रब उनके दर्द  मुझे दे दे
उनको राहत दे दे
उनके चेहरे का नूर लौटा दे
उन्हें मुस्कान से नवाज़ दे
मुझे आदत है दर्द सहने की
चुपचाप बर्दाश्त करने की
उनको सुकून दे सकूं
उनके अरमान लौटा सकूं  
उनके लिए कुछ कर सकूं
उनके काम आ सकूं
उस से बेहतर कुछ नहीं
दिल से चाहा उन्हें 
चाहत में खुद को मिटा दूं
उस से बड़ी कोई इबादत
मेरे लिए नहीं
28-01-2011
शायरी,मोहब्बत,इबादत,चाहत ,नज़्म
E

क्या मनाऊँ,होली और दीवाली,इस देश में अब रीत निराली


क्या मनाऊँ,
होली और दीवाली
इस देश में अब
रीत निराली
किसी की मौत,
भूख से होती
किसी की हर दिन
होली,दीवाली,
किसी का पेट साल
भर खाली
किसी पेट कभी ना
भरता
धन उसे निरंतर
भाता
जितना आए कम
पड़ता
कोई मुश्किल से
जीता
कोई धन के लिए
रोता
रोज़ समेटता
भण्डार करता
सब्र खोता बेसब्र
मरता
सब कुछ ज़मीं पर
छोड़ता
फिर भी कभी संतुष्ट
ना होता
जीवन भर तृष्णा
और होड़ में
जीता
28-01-2011
E

रात दबे पैर जाती भोर होती, सूरज की किरणें,धरती को रोशन करती


रात दबे पैर जाती
भोर होती
सूरज की किरणें
धरती को रोशन करतीउसका ताप बढाती
कोयल कूंकती
कलियाँ खिलती
फूल में बदलती
मौसम में रवानी आती
हर ठहरी चीज़
चलने लगती
हर चीज़ में गति 
आती
घड़ी की सुई आगे बढ़ती
दोपहर के बाद शाम होती
रात को निमंत्रण देती
भोर से पहले
हर चीज़ ठहरती
घड़ी समय की
निरंतरचलती रहती
कुछ 
भी हो जाए कभी
ना रुकती
एक ज़िन्दगी आती
दूसरी जाती
कहानी बार बार दोहराई
जाती
28-01-2011

जो भी उन्हें देखता,दिल थाम के बैठता



जो भी
उन्हें देखता
दिल थाम के बैठता
याद कुछ और ना
रहता
ख़्वाबों ख्यालों में
उन्हें पाता
अंदाज़ जीने का 
बदलता
होश अपना खोता
 मदहोशी में जीता
नाम उसका निरंतर
पुकारता
हुस्न नहीं दरवेश हैं
या नुमाइंदा खुदा का
हर शख्श वश में
होता
निरंतर इबादत उनकी
करता
नो जागता ना सोता
दिन रात नाम उनका
जपता
हर पल मुश्किल से
काटता
28-01-2011