ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 22 जनवरी 2011

किस्मत हमारी,जो तुम हमारी बनी


किस्मत
हमारी जो तुम
हमारी बनी
मोहब्बत तुमने हमसे करी
गले बहुतों के नहीं उतरी
जुदा हो जाएँ कोशिश
खूब करी
हर तरकीब इस्तेमाल करी
शहर में बदनामी भी करी
नियामत खुदा की ,
मात उनको मिली  
हर कोशिश बेकार करी
कोशिश निरंतर अब भी जारी
मगर जान गयी दुनिया सारी
तवोज्जो उनकी बात को
ना  देती
हर बात हंसी में टालती
बेचैनी उनकी
बढाती
22-01-2011

क्यूं आँखें चुरा रहे हो,देख कर अनदेखा कर रहे हो



क्यूं 
आँखें चुरा रहे हो
देख कर अनदेखा
कर रहे हो
कैसे पहचान लिया
कल अँधेरे में टकराए थे
हाथों ने हाथों को छुआ
साँसों ने साँसों को
महसूस किया
किसी और की उम्मीद
में हमें पाया
हादसा तुम्हारे लिए
हमारे लिए
तोहफा खुदा का था
जहन पर छा गया
हुस्न तुम्हारा
घर बसा चुका दिल में
चेहरा तुम्हारा
निरंतर उम्मीद में अब
बिछाएँगे आँखें
हर शाम इंतज़ार करेंगे
उस जगह जा कर
कभी तो दिल तुम्हारा
पसीजेगा 
आँखों से आँखें
लड़ाओगे
साँसों से सांसें
मिलाओगे
उजाले में भी  ना
शरमाओगे
22-01-2011

जब तक पैगाम उनका आया,चाहने वाला चला गया


सोचने में
 वक़्त उन्होंने इतना
लगाया 
जब तक पैगाम उनका
आया
चाहने वाला चला
गया
इंतज़ार में जनाजा
उठ गया
ज़न्नत से देखता होगा
सवाल खुदा से करेगा
क्यूं मुझ को ज़मींदोज़
किया
उन्हें भी कहीं का ना
रखा
नाम आशिक के साथ
जोड़ दिया
निरंतर बातें बनाने का
 मौक़ा लोगों को
दे दिया
काश जीते जी अरमान
 पूरे करता
कब्रिस्तान की जगह
 उन के बाजू में
होता
22-01-2011

उनका दुनिया से जाना हुआ,मैं अकेला हुआ



उनका 
दुनिया से जाना हुआ
मैं अकेला हुआ
साथ छूट गया
सफ़र अधूरा रह गया
मायना ज़िन्दगी का
बदल गया
दिन अब रात सा लगता
अन्धेरा दूर ना होता
रात दिन सी होती
नींद नहीं आती
हर लम्हा पहाड़ लगता
जीना निरंतर मजबूरी
लगता
अहसास ना था
मोहब्बत का सिला
ऐसा भी होता है
साथी बिछड़े तो सिर्फ
शून्य बचता 
मोहब्बत में ग़ुम
जोड़ों को देख डरता हूँ
जुदा ना हो कभी
दुआ करता हूँ
जाना हो जहाँ से तो
साथ जाएँ
अकेला ना कोई
रह जाए
22-01-2011

मोहब्बत का नाम बदल दो,इसे कुछ और कह दो

मोहब्बत 
का नाम बदल दो
इसे कुछ और कह दो
मोहब्बत(लफ्ज)को लोग
एक निगाह से देखते
निरंतर मतलब एक
निकालते
माँ की ममता को इश्क
समझते
भाई-भाई,गुरु-शिष्य के
प्रेम को टेढ़ी 
नज़रों से देखते
गर बात कोई हंस के
किसी मोहतरमा से करले
तारीफ़ में दो लफ्ज कह दे
इसका का मतलब 
कुछ और निकालते
खुले दिमाग से नहीं सोचते
मोहब्बत को प्यार
जिस्मानी समझते
मोहब्बत पाक,निश्चल, 
इज्ज़त भी होती
इस बात को कहाँ 
समझते
हकीकत कहाँ जानते
दाग मोहब्बत के नाम पर
सदियों से लगे
आगे ना लगे, 
ऐसा कुछ कर दो
मोहब्बत को कुछ और 
कह दो
नाम इसका बदल दो
22-01-2011

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

कैसे क़र्ज़ अदा करूँ?



कैसे क़र्ज़ 
अदा करूँ गुरुओं का
जिन्होंने लिखना,पढ़ना
सिखाया
माँ-बाप का
जीवन जिन्होंने दिया,
जीना सिखाया
पत्नी का
जीवन यात्रा में
बहुत कुछ सहा
फिर भी हर पल
 साथ निभाया
बच्चों का जिन्होंने
अधूरापन मेरा मिटाया
दोस्तों का जिन्होंने
 मुझे जाना पहचाना
हर वक़्त साथ दिया
पड़ोसियों का,जिन्होंने
अहसास
किसी के पास होने का दिया
भाई,बहन,परिवार का
अकेला नहीं हूँ,
सदा महसूस कराया
मेरे मरीजों का,
जिन्होंने इलाज कराया
विश्वाश मुझ पर जताया 
मेरे मोहल्ले का
जिसने पता मेरा बताया
शहर और शहरवासियों का 
जिन्होंने वजूद मेरा बनाया
देश का जिसने सम्मान से
भारतीय कहने का
गर्व दिया
कलम का जिसने
मनोभाव लिखना सिखाया
कागज़ का,जिस पर 
ख्यालों को उकेरा
पाठकों का,जिन्होंने 
होंसला मेरा बढाया
खुदा का जिसने सब
कुछ दिया
सर ऊंचा रखना सिखाया
शायद क़र्ज़,क़र्ज़ ही रहेगा
ना उतरेगा ना कभी कम होगा
निरंतर बढेगा
उतारना है सोचने से
दिल को सुकून,दिमाग को
चैन मिलेगा
21-01-2011