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गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

हमारी खता की सज़ा उन्हें कैसे दें ?


हमारी खता की सज़ा उन्हें कैसे दें ?
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हमारी हसरतों का 
कातिल उन्हें कैसे कहें ?
हमारी खता की 
सज़ा उन्हें कैसे दें ?
गर्दिश-ए-हालात की 
ज़िम्मेदारी उनकी नहीं
उनकी बेरुखी भी
उनकी नहीं
कुछ किस्मत ही
हमारी ऐसी थी
हम ही ना रख सके
उन्हें सम्हाल कर
अरमानों की कश्ती को 
साहिल तक न पहुंचा सके
उनके मुस्काराने को
मोहब्बत समझा था
हमने
वादों को हकीकत
माना था  हमने 
उन्हें गुनाहगार 
कैसे कहें 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
शायरी,नज़्म 
24-12-2011
1886-54-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. उनके मुस्काराने को
    मोहब्बत समझा था
    हमने
    वादों को हकीकत
    माना था हमने
    यही मासूमियत तो नादाँ दिलों को मार गई .

    उत्तर देंहटाएं
  2. हमारी
    हसरतों का कातिल
    उन्हें कैसे कहें ?
    हमारी खता की सज़ा
    उन्हें कैसे दें ?
    गर्दिश-ए-हालात की
    ज़िम्मेदारी उनकी नहीं.......waah bahut hi uttm rachna....bdhai sweekaren

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्या यही प्यार है :-)समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है। http://aapki-pasand.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं