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सोमवार, 12 दिसंबर 2011

बड़ी शिद्दत से दर्द-ऐ-दिल सुनते हैं लोग


बड़ी शिद्दत से
दर्द-ऐ-दिल सुनते हैं
लोग
दिलासा भी देते हैं
लोग
हाथ पकड़ते हैं
पर थाम कर रखते
नहीं लोग
निरंतर रिश्ते बनाते हैं 
फिर भूल जाते हैं लोग
ना जाने क्यूं साथ
निभाते नहीं लोग
या तो हम से ही 
कुछ खता होती होगी 
या फिर ज़माने का
दस्तूर 
निभाते होंगे लोग
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
11-12-2011
1852-20-12

5 टिप्‍पणियां:

  1. संवेदना के धरातल पर जो जुड़ गए वो कभी अलग नहीं होते...!
    रिश्ते निभाए नहीं जाते... रिश्ते निभ जाते हैं, गलत हो सकता है... पर यह मेरा जिया हुआ अनुभव है!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सटीक लिखा है आपने! यही ज़माने का दस्तूर है! हम मिलते हैं हजारों लोगों से पर उनमें से कुछ लोग ही रिश्ता निभाते हैं !
    मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. कुछ रिश्ते अधूरे ही रहते है

    उत्तर देंहटाएं
  4. Shashi purwar to me
    show details 1:36 PM (4 hours ago)
    bahut sunder ............aapki kavita ko padh kar kai bar shabd nahi milte .

    उत्तर देंहटाएं