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सोमवार, 5 दिसंबर 2011

एक फोटो फ्रेम के मुख से


कमरे के कौने में ,
मेज पर पड़े चांदी के
रत्न जडित फोटो फ्रेम
पर दृष्टी पडी
जिसमें  मेरे पर दादा की
तस्वीर लगी हुयी थी
तो मुझे से रहा ना गया
उसे हाथ मैं उठा कर
देखने लगा
ऐसा प्रतीत हुआ मानों
कह रहा हो
मैं सामान्य फोटो फ्रेम
नहीं हूँ
कई दशकों से इस कमरे में
होने वाले
हर कार्य कलाप का गवाह हूँ
चंचल बचपन ,
जोश से भरी
जवानी और थके हुए
झुर्रियां लिए बूढ़े चेहरों की
तसवीरें मैंने ह्रदय से
लगा कर रखी हैं
जो संसार से चले गए
उन्हें भी प्रेम से संजोया है
मेरा स्थान बदलता रहा ,
पर कमरा नहीं बदला
मैंने खामोशी से घर के
लोगों को
बचपन से बुढापे तक
संसार में आते जाते देखा
घर में किसी ने जन्म लिया
या फिर कोई सदा के लिए
चला गया
मुझे भी भरपूर खुशी और
दुःख हुआ
घर के लोगों को हँसते ,
रोते देखा
लड़ते झगड़ते देखा
प्यार मोहब्बत में जीते देखा
जीवन के हर रंग को
समीप से देखा
पता नहीं कब तक देखना है
जब तक
घर में सम्पन्नता है
मुझे पूरी आशा है
कोई मुझे कुछ रूपये
के लिए
अपने से दूर नहीं करेगा
मैं हँस बोल
नहीं सकता तो क्या
इस घर को अपना
मानता हूँ
सदा घर की समृद्धी के लिए
परमात्मा से निरंतर प्रार्थना
करता हूँ
किसी और जगह जा कर
मुझे खुशी नहीं मिलेगी
उसकी ह्रदय से
निकली प्यार भरी
बातों ने
मुझे भाव विहल कर दिया
फोटो फ्रेम को मैंने
सीने से लगा दिया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-12-2011
1838-06-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. गहन विचारों से जीवन के कई रूपों को बयां करती, अद्भुत रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  2. भावपूर्ण मार्मिक रचना शुभकामनाएँ...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खूब....दिल को छू लेने वाले अंदाज़ में लिखी गई कविता

    उत्तर देंहटाएं