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रविवार, 4 दिसंबर 2011

सब चले जा रहे हैं


सब चले जा रहे हैं
कुछ दौड़ रहे हैं
कुछ धीमी चाल से
चल रहे हैं
कम ही हैं जो
सामान्य गति से
चल रहे हैं
मगर चल सब रहे हैं
मरीचिका के भ्रम में
आगे बढे जा रहे हैं
एक पड़ाव गुजरता
दूसरा दिखने लगता
आराम  का समय
भी नहीं
जीने की इच्छा
मगर पीछे ना रह जाएँ
इस लिए बिना जिए
मृत सामान
अंधी दौड़ में लगे हुए हैं
कहते हैं ,बहुत खुश हैं
फिर भी निरंतर रो रहे हैं
धन दौलत की
कमी नहीं जिनके पास
समाप्त नहीं हो जाए
कोई उनसे आगे कैसे
निकल जाए
थके हुए ,रोग ग्रस्त
मन और शरीर को
ढोए जा रहे हैं 
गरीबपेट की भूख
सर पे छत  के लिए
मरे जा रहे हैं
सब चले जा रहे हैं
निरंतर सपने देखे
जा रहे हैं
खोखली हँसी लिए
चेहरे पर चेहरा चढ़ाए
माया के भ्रम जाल में
फंस कर
परमात्मा के रास्ते से
भटक रहे हैं
बिना रुके चले जा रहे हैं
सब चले जा रहे हैं......
02-12-2011
1835-100-11-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. भ्रम जान कर जीना सरल हो जाता है ..और सच के साथ मुश्किल
    बहुत खूबसूरत शब्दों की प्रस्तुति है आपकी कविता में

    उत्तर देंहटाएं