ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

हँसने की आदत थी हमारी


हँसने  की
आदत थी हमारी
अब मुस्कारने में भी
दिक्कत होती है
रोने की फितरत
नहीं थी हमारी
अब बहुत ज़ल्द आँखें
नम होती हैं
अलमस्त घूमते थे कभी
अब घर से
बाहर निकलने की
इच्छा भी नहीं करती
ऐसा नहीं
कमज़ोर हैं हम
क्या करें
उस दौर की यादें तंग
करती हैं
हँसते चेहरे पर
मायूसी लाती हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
20-12-2011
1872-40-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. "हँसने की
    आदत थी हमारी
    अब मुस्कारने में भी
    दिक्कत होती है
    कभी रोने की फितरत
    नहीं थी हमारी
    अब बहुत ज़ल्द आँखें
    नम होती हैं
    अलमस्त घूमते थे कभी
    अब घर से
    बाहर निकलने की
    इच्छा भी नहीं करती
    ऐसा नहीं
    की कमज़ोर हैं हम
    क्या करें"

    बस..
    ऐसे ही है हम....!!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

    उत्तर देंहटाएं
  3. भावनाओं से अभिभूत रचना,दिल को छू गई...

    उत्तर देंहटाएं