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गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

हाथ की लकीरें

दिहाड़ी मज़दूर की कहानी
==============
सुबह नींद खुलती हैं
रोज़ की तरह
आशाओं से भरी दृष्टि
हथेलियों पर पड़ती
हाथों की लकीरों
वैसी की वैसी दिखती
हथेली अधिक खुरदरी
चमड़ी कल से अधिक
मोटी लगती
समझ गया आज भी
कुछ नया नहीं होगा
निरंतर सोचता था
क्यों परमात्मा ने
हाथों में लकीरें बनायी ?
क्यों उन्हें भाग्य से जोड़ दिया
जब लकीरें नहीं बदलती
तो किस्मत कैसे बदलेगी
कितनी भी मेहनत
मजदूरी कर लो
हालत वैसी ही रहेगी
हो सकता है
परमात्मा ने आशा
बनाए रखने के लिए
हाथों में लकीरें बनायी होगी
चलो कम से कम
निराशा तो कम होती है
लकीरें कभी तो बदलेगी
सोचते सोचते उठ कर
रोज़ की तरह मजदूरी
पर निकल पडा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
19-12-2011
1871-39-12

मज़दूर,गरीब,जीवन,ज़िंदगी, 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर एवं मार्मिक प्रस्तुति ।
    प्रभावी प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आशा-निराशा का उचित तालमेल,आशा ही सबसे बड़ी ताकत बनती है और कमजो़री भी फिर भी उसका साथ जीना सिखाता है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. निराशा तो कम होती है
    लकीरें कभी तो बदलेगी
    सोचते सोचते उठा
    रोज़ की तरह मजदूरी
    पर निकल पडा

    इन अंतिम पंक्तियों में जिन्दगी का सार लिख दिया आपने ...

    उत्तर देंहटाएं