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बुधवार, 14 दिसंबर 2011

ना ज़मीं तेरी ना आस्मां तेरा ,तूं इक मुसाफिर यहाँ

ना ज़मीं तेरी
ना आस्मां तेरा
तूं इक मुसाफिर यहाँ
फिर क्यूं करता है
तेरा मेरा
देखता है सपने हज़ार 
निरंतर 
रखता है इच्छाएं अपार
पालता है  बैर मन में
जताता है प्यार
जीवन भरजोड़ तोड़ में 
लगा रहता है 
 करता नहीं आराम
छोड़ जाता हैं 
यहाँ का यहीं पर
फिर क्यों नहीं करता है
ध्यान 
गर इसी में डूबा रहा
तेरे जाने के बाद 
लेगा नहीं नाम तेरा कोई 
करना है तो कुछ ऐसा कर
तूं काम इंसान के आये 
जोड़ना है तो 
जोड़ लोगों का प्यार
तेरे जाने के बाद भी
लोग करें तुझ को याद  
ना ज़मीं तेरी
ना आस्मां तेरा
तूं इक मुसाफिर यहाँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
13-12-2011
1857-26-12

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