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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

अपनों का खार सहता रहा


अपनों का
खार सहता रहा
दूसरों पर
मोहब्बत लुटाता रहा
अश्कों को हंसी से
छुपाता रहा
दिल में रोता रहा
सुकून की तलाश में
निरंतर भटकता रहा
ना वफ़ा मिली
ना सुकून मिला
उम्मीद में
वक़्त गुजारता रहा
ना शिकवा
ना शिकायत किसी से
जो लिखा था किस्मत में
भुगतता रहा
ग़मों से
दोस्ती निभाता रहा
,तन्हाई में जीता रहा 
12-12-2011
1854-22-12

7 टिप्‍पणियां:

  1. ना शिकवा
    ना शिकायत किसी से
    इस तठस्थ भाव को प्रणाम!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सभी का भोग्य और प्राप्य यही है लिखा आपने भोगा हम सबने भी यही है .सुन्दर रचना .

    उत्तर देंहटाएं
  3. ना शिकवा
    ना शिकायत किसी से
    जो लिखा था किस्मत में
    भुगतता रहा
    ग़मों से
    दोस्ती निभाता रहा
    ,तन्हाई में जीता रहा.... निरंतर जी,सही लिखा ...... आज के वक्त की ये ही हकीकत है.......जिधर जाओ हर तरफ एक मेला मिलता है....मन के भीतर झाकों ,हर कोना तन्हां मिलता है .....

    उत्तर देंहटाएं
  4. सब वही भोगते हैं जो उनकी किस्मत में होता है .. सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस तन्हाई में रहते हुवे भी दूसरों को खुशियाँ बांटना आसान नहीं होता ... अच्छी रचना है ...

    उत्तर देंहटाएं