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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

दहशत ने शक दिल में बसा दिया


मैंने समझा
तुम भी ग़मज़दा हो
मेरी तरह
तुम्हें भी कोई साथ
चाहिए
अंदाज़ मेरा गलत
निकला
तुम ग़मज़दा भी हो
खौफज़दा भी हो
लगता है
खूब भुगता है तुमने
लोगों की फितरत  को  
नतीजतन दोस्ती की
इल्तजा को ठुकरा दिया
बेदिलों  की भीड़ में
मुझे भी
शामिल कर दिया
बेगुनाह को गुनाहगार
करार दे दिया
दहशत ने शक 
दिल में बसा दिया 
12-12-2011
1856-24-12

1 टिप्पणी:

  1. वाकई.....अनुभव से सोच बदल जाती है। अच्‍छी रचना।

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