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गुरुवार, 24 नवंबर 2011

एक और अफ़साना


उन्होंने अपना हाथ
मेरी तरफ बढाया
मैं सोच में पड़ गया
थामूं या ना थामूं
पहले भी
हाथ जिसका थामा
मंझधार में छोड़ कर
चला गया
हाँ ना करते करते
डरते डरते भी
उनका हाथ थाम लिया
फिर वही हुआ
जो होता आया था
उन्होंने भी वही किया
मुझे मंझधार में छोड़ दिया
बदकिस्मती का एक और
अफ़साना मेरी ज़िन्दगी के
पन्नों में जुड़ गया
अब खौफज़दा हूँ
यकीन से कोसों दूर हूँ
लोग निरंतर
मुझे डराने के लिए
बस हाथ आगे कर देते हैं
खुद खुल कर हँसते हैं
24-11-2011
1814-85-11-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. ज़िंदगी कटु सत्य है सपना नहीं है
    खेल इसकी आग में तपना नहीं है,
    कौन देगा साथ इस भूखी धरा पर
    जबकि अपना खास भी अपना नहीं है।

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