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बुधवार, 9 नवंबर 2011

भीड़ से घिरा हूँ फिर भी अकेला हूँ


भीड़ से घिरा हूँ
फिर भी अकेला हूँ
बिना आवाज़ का
साज़ हूँ
किसी अपने की 
तलाश में भटक
रहा हूँ
निरंतर अँधेरे में
उजाला
ज़िन्दगी में
सुर ढूंढ रहा हूँ
कोई समझ सके
मुझको
ऐसा दोस्त खोज
रहा हूँ
09-11-2011
1765-33-11-11

8 टिप्‍पणियां:

  1. यही सच है हम सभी इंसानों का...
    भीड़ में भी सभी तत्वतः अकेले ही हैं!

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-694:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

    उत्तर देंहटाएं
  3. भीड़ में अकेलापन .. बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  4. राजेन्द्र जी नमस्कार, शी कहा आपने रिश्तो के झ्मेले है पर फिर भी कभी कभी लगता है जैसे मन से सब अकेलें है।देखे मेरी पोस्ट

    उत्तर देंहटाएं