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रविवार, 6 नवंबर 2011

मजबूरी में हँसता हूँ


क्या करूँ?
मजबूरी में हँसता हूँ
ग़मों को छुपा कर
रखता हूँ
लोगों से डरता हूँ
सवालों से बचता हूँ
दिलासा के नाम पर
सैकड़ों सवाल पूछेंगे
जवाब पर यकीन
ना करेंगे  
निरंतर नश्तर चुभायेंगे
ग़मों को भूलने ना देंगे
ज़ख्मों को फिर से हरा
कर देंगे
मुझे जीने ना देंगे
06-11-2011
1751-20-11-11

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 07-11-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. बस जैसे भी हँसते रहे पर हँसते रहे :)

    Gyan Darpan

    उत्तर देंहटाएं
  3. सच कभी कभी हँसना भी बहुत बड़ी मजबूरी होती है.
    बहुत बढ़िया मनोभाव..
    .

    उत्तर देंहटाएं
  4. ज़िंदगी बहुत कुछ सिखाती है कभी हँसती है कभी रुलाती हैं मगर जो हँसता है हर गम ओ खुशी में ज़िंदगी उसे के आगे सर झुकती है इसलिए हँसते रहिए.....और :-)
    समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

    उत्तर देंहटाएं