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रविवार, 6 नवंबर 2011

ना जाने क्यूं उन्हें हमारी याद नहीं आती


ना जाने क्यूं उन्हें
हमारी याद नहीं आती
कैसे इतना भी
कोई भूलता किसी को
हमें एक हिचकी भी
नहीं आती
चाहत की सारी बातें
 ना जाने
कहाँ गुम हो जाती
एक तिनके सी
हवा में उड़ जाती
यहाँ निरंतर रातों की
नींद हराम होती
वहाँ बेफिक्री से
ज़िन्दगी जी जाती
ना जाने क्यूं उन्हें
हमारी याद नहीं आती
06-11-2011
1747-16-11-11

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    देवोत्थान पर्व की शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  3. यहाँ निरंतर रातों की
    नींद हराम होती
    वहाँ बेफिक्री से
    ज़िन्दगी जी जाती
    ना जाने क्यूं उन्हें
    हमारी याद नहीं आती

    बहुत बढिया रचना !!

    उत्तर देंहटाएं