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सोमवार, 28 नवंबर 2011

हँसमुखजी का पड़ोसी से झगडा हो गया(हास्य कविता)


पतले दुबले हँसमुखजी का
मोटे गैंडे जैसे पड़ोसी से
झगडा हो गया
पड़ोसी ने उन्हें उड़ता हुआ
तिनका कह दिया
हँसमुखजी का
चेहरा लाल हो गया
उनका पुरुषत्व जाग गया
क्रोध में उन्होंने पड़ोसी को
धरती का बोझ करार दे दिया
पड़ोसी की पत्नी ने सुना,तो
वो भी मैदान में कूद पडी
पती को यथा शरीर तथा नाम
देने से बिफर गयी
पड़ोसी के बोलने के पहले ही
उसने हंसमुखजी को जवाब दे दिया
धरती के बोझ होगे तुम
हँसमुखजी की पत्नी कम नहीं थी
कोई महिला
उसके पती को कुछ कह दे
बर्दाश्त नहीं हुआ
उसने लपक कर पड़ोसी को
उड़ता हुआ तिनका कह  दिया
बस हाहाकार मच गया
पड़ोसन बोली ठीक से बात करो
इतने मच्छर जैसे भी नहीं हैं कि
इन्हें उड़ता हुआ तिनका कहो
बात बढ़ती गयी
दूसरा  पड़ोसी सारी बात
सुन रहा था
उससे रहा नहीं गया
वो बीच में कूदा,
दोनों को शांत किया
फिर हँसमुखजी की पत्नी से बोला
आप इन्हें उड़ता हुआ तिनका
मत कहिये ,
पड़ोसी की पत्नी को कहा
आप हँसमुखजी को
धरती का बोझ नहीं कहिये
दोनों में राजीनामा कराया
दोनों ने हाथ मिलाया
पहले रहते थे
निरंतर वैसे ही रहने लगे
लोग हँसमुखजी  को
उड़ता हुआ तिनका
पड़ोसी को
धरती का बोझ
कहने लगे
27-11-2011
1822-87-11-11

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