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शनिवार, 26 नवंबर 2011

अब तसल्ली मुकाम मेरा


अब ना पाने की
ख्वाइश 
ना रोने की ज़रुरत
मुझको
ना ग़मों की दहशत
ना मंजिल की तलाश
मुझको
अब तसल्ली मुकाम
मेरा
खुश हूँ उसमें
जो मिला,ना मिला
निरंतर मुझको
25-11-2011
1818-83-11-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. एक तसल्ली ही तो हम रख नहीं पाते,सुंदर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी लेखनी में जीवन की सीख मिलती है ...दिल की आवाज़ ...शब्दों में समझ आती है .......आभार

    सूख -लिप्सा को समझ ले ,ज्यों आतप की प्यास
    और मृत्यु का आगमन ,जैसे उतरी शाम |

    उत्तर देंहटाएं