ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

सोमवार, 21 नवंबर 2011

रास्ते अलग क्यों थे ?


रास्ते अलग क्यों थे ?
=======
दोनों मित्र  थे
एक यीशु मसीह को 
मानता
चर्च जाता
दूसरा राम-क्रष्ण को 
मानता
मंदिर जाता
इमानदारी से कर्म करते
निश्छल निष्कपट
जीवन जीते
थोड़े अंतराल में
दोनों का निधन हुआ
एक को दफनाया गया
दूजे को जलाया गया
दोनों मित्र स्वर्ग में मिले
आश्चर्य में डूब गए
एकटक एक दूजे को
देखने लगे
मन में सोचने लगे
जब मंजिल एक है 
फिर रास्ते अलग क्यों थे ?
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-11-2011
1805-76-11-11

14 टिप्‍पणियां:

  1. कविता का भाव बहुत अच्छा लगा.
    घुघूतीबासूती

    उत्तर देंहटाएं
  2. कल 23/11/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्‍वागत है, चलेंगे नहीं तो पहुचेंगे कैसे .. ?..
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. डॉ. राजेन्द्र जी यह स्वर्ग कहाँ होता है.
    आपकी प्रस्तुति सुन्दर प्रेरणादायक है.
    आभार.

    समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.
    हार्दिक स्वागत है आपका.

    उत्तर देंहटाएं
  5. सब लोग यही समझ लें...तो कोई झगडा ही शेष न रहे

    उत्तर देंहटाएं
  6. रास्ता देखें तो वह भी एक ही है. कविता का कथ्य सुंदर भाव दे जाता है.

    उत्तर देंहटाएं
  7. ये अलग रास्ते हमारे खुद के बनाये हैं ..
    इस सार्थक रचना के लिए बहुत बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  8. सृष्टि का सार अपने में संजोये अद्भुत रचना सर..
    सादर बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  9. एकता के सूत्र में पिरोती कविता ! शानदार बधाई जी !

    उत्तर देंहटाएं
  10. bahut khub.......stay bata diya kavita ke maadhyam se......aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  11. दोनों मित्र स्वर्ग में मिले
    तो आश्चर्य में डूब गए
    एकटक एक दूजे को
    देखने लगे
    मन में सोचने लगे
    जब मंजिल एक है
    तो फिर रास्ते अलग
    क्यों थे ?

    सार अपने में संजोये अद्भुत रचना .....

    उत्तर देंहटाएं