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शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

असंतुष्ट


सदा कहता था
जो मिलना चाहिए था
नहीं मिला
जो नहीं मिलना चाहिए था
वो मिला
परमात्मा की इच्छा का
कभी सम्मान नहीं किया
जीवन भर
दुखड़ा रोता रहा
परमात्मा को कोसता रहा
निरंतर असंतुष्ट रहा
असंतुष्ट ही चला गया
18-11-2011
1796-67-11-11

3 टिप्‍पणियां:

  1. असंतोष एक बार घर कर जाए तो वह जड़ें गहरी ही करता जाता है....

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  2. दर्द ही दर्द है जीवन में,परंतु आशा की किरण किसी मरहम से कम नहीं...

    उत्तर देंहटाएं
  3. असंतुष्‍टता का भाव मन को संतुष्‍ट कहां रहने देता है ... ।

    उत्तर देंहटाएं