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शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

कभी हम खुद को ही बहला लिया करते


कभी हम खुद को ही
  बहला लिया करते
शीशे में
 अपना अक्स देख कर
खूब मुस्कराया करते
अपने
खूबसूरत चेहरे पर
इतराया करते
जो खुले आम नहीं
कह पाते
निरंतर अकेले में
कह लिया करते
खुद की नादानियों पर
खुद को
डांट दिया करते
चाहने वालों को
 ख़्वाबों में देख लिया
करते
दिल के अरमान
ख़त में लिख कर
खुद ही पढ़ लिया करते
कभी हम खुद को ही
  बहला लिया करते
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर", 
11-11-2011
1775-43-11-11

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