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शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

सामने वाले घर में रहती थी ( हास्य कविता)


 सामने
वाले घर में रहती थी
देर रात उनके कमरे की
बत्ती जल रही थी
दूर से मेरे मन में
बेचैनी पैदा कर रही थी
उन्हें देखने की इच्छा
हो रही थी
एक नज़र मेरे कमरे की
तरफ देख लें
नज़रों से नज़रें मिला लें
उम्मीद में मैंने भी
कमरे की खिड़की खोल दी
निगाहें खिड़की पर लगी थी
नींद उड़ गयी
आँख़ें सुर्ख लाल हो गयी
रात गुजरती गयी
उम्मीद कम नहीं हुयी
कब भोर आयी खबर
भी ना हुयी
आज की रात भी सूनी रही
मन की परेशानी
कम ना हुयी
किसी तरह उन्हें खबर
भिजवायी
रात की कहानी उन्हें
बतायी
जवाब में छोटी से चिट्ठी
मुझे भिजवायी
मेरे ख़त की जम कर
हँसी उडायी
इस से बड़ी बेवकूफी
उन्होंने
कभी नहीं देखी थी
बत्ती जला कर सोयी थी
क्यूं तुमने अपनी नींद
गंवायी ?
क्यूं दिल की चाहत
पहले ना बतायी ?
अब मंगनी हो चुकी है
अगले महीने शादी है
निरंतर
जलती बत्तियों से
परेशान ना हुआ करो
हकीकत की दुनिया में
जिया करो
मोहब्बत करने से पहले
सामने वाले का दिल भी
टटोल लिया करो
21-10-2011
1682-89-10-11

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