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सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

इंतज़ार

दरख्तों के लम्बे
सायों के बीच
शाम के धुंधलके में
वो आज फिर उसके
इंतज़ार में खडी थी
आँखें रोज़ की तरह
सड़क पर गढ़ाए 
बेचैनी में
ऊंगलियों से खेल 
रही थी
वक़्त गुजरता जा 
रहा था
शाम गहराने लगी
चेहरे पर चिंता की 
लकीरें
बढ़ती जा रही थी
उसका पता ना था
आँखों से आँसू निकलते
उस से पहले ही
दूर एक धुंधली परछायी
नज़र आने लगी 
उम्मीद में
कदम खुद-ब-खुद
उस तरफ बढ़ चले
नज़दीक पहुँचने पर
उसकी
सूरत साफ़ दिखने लगी

वो खून से लथपथ था
पास आता,
गले मिलता कुछ कहता
उस से पहले ही
ज़मीन पर ढेर हो गया
उसका इंतज़ार
कभी ख़त्म ना हुआ
आज भी
शाम के धुंधलके में
दरख्तों के
लम्बे सायों के बीच
वो ऊंगलियों से
खेलते खडी दिखती है
चेहरे पर 
उससे मिलने की
उम्मीद अब भी
साफ़ झलकती है
03-10-2011
1600-09-10-11

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