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मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

प्यार जब हवस बन जाता

प्यार जब 
हवस बन जाता
रिश्तों को  
तार तार करता
घर तक 
बाज़ार बन जाता 
हैवानित से जीना
मकसद हो जाता
दिन के उजाले में
रात सा 
अन्धेरा हो जाता
उम्र का
लिहाज़ ना रहता
ख्याल 
सिर्फ तन का रहता
निरंतर जिस्म से
खेलना
मनोरंजन बन जाता
औरत का चीखना
कानों में संगीत लगता
इंसान 
आदमखोर हो जाता
चैन 
उसे कभी नामिलता
जीने का हक खो देता
सज़ा उसको खुदा देता
अंत दोजख में होता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्यार जब 
हवस बन जाता
रिश्तों को  
तार तार करता
घर तक 
बाज़ार बन जाता 
हैवानित से जीना
मकसद हो जाता
दिन के उजाले में
रात सा 
अन्धेरा हो जाता
उम्र का
लिहाज़ ना रहता
ख्याल 
सिर्फ तन का रहता
निरंतर जिस्म से
खेलना
मनोरंजन बन जाता
औरत का चीखना
कानों में संगीत लगता
इंसान 
आदमखोर हो जाता
चैन 
उसे कभी ना मिलता
जीने का हक खो देता
सज़ा उसको खुदा देता
अंत दोजख में होता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,प्यार,हवस
04-10-2011
1605-13-10-11

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