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रविवार, 23 अक्तूबर 2011

हाल-ऐ-दिल किस से कहें


हाल-ऐ-दिल किस से कहें
हर शख्श
गम में डूबा हुआ 
सुकून चैन से दूर मिला 
हंस हंस कर कितना भी
दिखाओ
हकीकत कितनी भी
छिपाओ
दिल किस का खुश रहता
मोहब्बत के मकाँ
ढह चुके
अब दिलों में 
घर किस का बनता
इंसान, इंसान से दूर
हो गया
कोई अपना ना लगता
निरंतर
 शक और नफरत ने
यकीन
 रिश्तों से उठा दिया
हाल-ऐ-दिल किस से कहें
हर शख्श पराया
लगता
23-10-2011
1695-102-10-11

3 टिप्‍पणियां:

  1. रिश्तों में आई दूरियों का दर्द अभिव्यक्त करती सहज रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  2. jab koi nahi sunta to apne aap hi apne dil ko manana padhta hai..
    badiya prastuti..
    Deepawali kee haardik shubhkamnayen!

    उत्तर देंहटाएं
  3. badhiya , har koi dhoondhta hai ...jo seene se laga le ...ho aisa ik jahaan .....magar achchha ho ki ham hi vo kandha ban jaayen ...

    उत्तर देंहटाएं