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सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

हसरत

हसरत
मन में संजोयी मैंने
तुम सामने बैठी हो
मैं तुम्हें देखता रहूँ
खामोशी से
तुम्हारी मीठी बातें
सुनता रहूँ
तुम  कानों में मिश्री
घोलती रहो
मुझे
मदहोश करती रहो
मैं नशे में
निरंतर झूमता रहूँ
कब रात बीती  ,
कब सुबह हुयी
हवा भी ना लगे
उम्र गुजर जाए
वक़्त दुनिया से
रुखसत होने का
आ जाए
पता भी ना चले
03-10-2011
1601-10-10-11

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    उत्तर देंहटाएं