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शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

आगे क्या होने वाला है ?


उम्र ढलने लगी थी
झुर्रियां बढ़ने लगी थी
सोच कांपने लगा था
विचारों का मंथन
त्वरित गति से
होने लगा था
आगे क्या होने वाला है ?
साफ़ दिखने लगा था
एक अजीब सा भय
मन में घर करने लगा
जीवन डगर
समाप्त होने का समय
अब दूर ना था
क्या होगा ?
कब अंत आयेगा ?
क्यों मनुष्य को
फिर लौटना पड़ता है
निरंतर मष्तिष्क में
सवाल कचोटने लगा
क्या करूँ
जिससे अंत समीप
ना आये
बहुत सहा जीवन में
जैसा चाहा
वैसा मिला नहीं 
फिर भी जीने की चाह
कम ना हुयी
परमात्मा अब पहले से
अधिक याद आने लगा
अधिक से अधिक

जी सकूँ
जाऊं भी तो चुपके से
पता भी ना चले
नाम मात्र भी

कष्ट ना सहना पड़े
रात सोऊँ सवेरे
जागूँ ही नहीं
यही सोच बार बार
मन में

आने लगा था
29-10-2011

1715-122-10-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. bahut hi khubsurti se bayan kiya hai aapne vicharo ka yah manthan ..........
    isi ka naam hai jeevan ,
    kal ki soch me hum
    aaj ko kyun kho jane de ,
    yam se jo na dare
    wahi to jeevan ka mol jane hai ...
    . jitna hai baki
    wahi kam hai to
    bhavishaye ki soch me
    aaj ko kyun kho jane de .......shashi

    उत्तर देंहटाएं
  2. अंत ध्रुव सत्य है...
    पर उसका स्मरण नहीं रहता आजीवन!
    मानव मन में उमड़ने वाले विचारों की गति को सहज भाषा मिली है!

    उत्तर देंहटाएं