ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

वक़्त का तकाजा है


वक़्त का तकाजा है
जो जैसा कर रहा
उसे वैसा करने दो
कातिलों को क़त्ल
फितरत मंदों को
फितरत पूरी करने दो
उनके शौक में खलल
ना डालो
चुपचाप सह लो
चुपचाप सुन लो
खामोशी से देख लो
रोना हो तो चुपके से
रोलो
जुबान खोली तो
ज़लज़ला आ जाएगा
हर बात का फ़साना
बन जाएगा
मुट्ठी भर अमन का
मंजर
ग़मों के ढेर में बदल
जाएगा
निरंतर दिलों में लगी
आग को कोई
बुझाने वाला ना
मिलेगा
17-10-2011
1666-74-10-11

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सही कहा,दुनिया की चाल ही ऐसी है.

    उत्तर देंहटाएं