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सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

जब भी कोई अपना बिछड़ता


जब भी कोई 
अपना बिछड़ता
वक़्त काटे नहीं
कटता
हर लम्हा पहाड़ सा
लगता
दिल निरंतर रोता
खुशियों का समंदर
सूख जाता
मन रेगिस्तान सा
सूना होता
यादों के सहारे जीना
होता
अश्क बहाना आदत
बन जाता
इंसान लुटा हुआ
महसूस करता
प्यासे पंछी सा
फडफडाता रहता
ज़िन्दगी के चौराहे पर
खुद को खडा पाता
कोई रास्ता नहीं
सूझता
हर सपना तार तार
हो जाता
जब भी कोई 
अपना बिछड़ता
09-10-2011
1624-32-10-11

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