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गुरुवार, 15 सितंबर 2011

हँसमुखजी कंगाल हो गए (हास्य कविता)

वक़्त की मार से
हँसमुखजी कंगाल
हो गए
मांग कर गुजारा
करने लगे
दो दिन भीख में
एक पैसा नहीं मिला
भूख से बिलबिलाने लगे
पैसे कमाने के
नए तरीके ढूँढने लगे
सीधे थाने पहुँच गए
गैंडे जैसे रिश्वत भख्शी 
थानेदार से कहने लगे
या तो हज़ार रूपये मांगो
नहीं तो
पांच सौ रूपये दे दो
थानेदार ने मोटी
गर्दन को ऊपर किया
हँसमुख जी को
बालों से पकड़ कर
अपनी तरफ खींच लिया
 
फिर सवाल किया
कौन है तूँ ?
क्या कह रहा है
मुझे समझ नहीं आ रहा है
मुझ से पैसे मांग भी रहा
देने को भी कह रहा
घिघियाते हुए
हँसमुख जी बोले
भिखमंगा हूँ
पैसे दे दोगे तो
चार पांच दिन आराम से
काट लूंगा
नहीं दोगे तो, आप मुझ से
रिश्वत मांग रहे हो
शोर मचा दूंगा
आप आग बबूला हो कर 
मुझे अन्दर बंद कर दोगे
आराम से खाने को मिलेगा
काम भी नहीं करना पडेगा
आपकी जोकर जैसी
शक्ल देख कर हँसता रहूँगा
चार पांच दिन
आराम से काटूंगा
15-09-2011
1510-81-09-11

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