ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

क्यूं ख्वाब देखता हूँ ?

क्यूं ख्वाब देखता हूँ ? 
बार बार दिल तोड़ता हूँ
हर बार चोट खाता हूँ
आदत से मजबूर हूँ
हंसने की कोशिश में
निरंतर रोता हूँ
हिम्मत नहीं खोता हूँ
उम्मीद फिर भी
रखता हूँ
कभी तो किस्मत
साथ देगी
यही सोच कर जीता हूँ
फिर से हंसने की
कोशिश करता हूँ 
15-09-2011
1509-80-09-11

3 टिप्‍पणियां:

  1. Indu Puri to me
    show details 6:42 PM (27 minutes ago)
    मेरे जैसा था बेचारा
    भागता रहा सपनों के पीछे.
    एक सपने को पूरा करने के पीछे जी जान लगाना .
    अपने छोटे छोटे सपनों के रूपों को साकार होते देखना
    पुलक उठता कभी
    कभी फिर भर जाता जोश से मन
    और देखने लगता है नये सपने.
    बरस...युग बीते
    कब???जान ही नही पाया
    जाना तो ये....कि
    उन्ही सपनों ने उसे प्रेरित किया कर्म के लिए ....
    कुछ न कुछ करते रहने के लिए
    उसने झुक कर चूम लिए अपने सपनों के कोमल कपोलो को
    ....ये ना होते तो.....क्या गुजार देता निरर्थक ही इस जीवन को
    कुछ तो दे जाते हैं हमारे सपने हमे...दुनिया को...समाज को
    इसलिए देखती रहती हूँ मैं नित नये सपने
    दूसरों की आँखों को भी सिखा देती हूँ सपने देखना
    हा हा हा

    उत्तर देंहटाएं