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सोमवार, 12 सितंबर 2011

क्यों हार से घबराता है ?

क्यों हार से घबराता है ?
व्यथित हो कर रोता है
क्यों भूल जाता है 
सूर्य भी चमक अपनी
खोता है
शाम तक मंद होता 
फिर अस्त होता है
आकाश पर रात भर
चाँद का आधिपत्य होता
भोर होते होते चाँद भी
थक कर पस्त होता
नए चमकते सूर्य को
स्थान देता है 
हार जीत जीवन का मर्म
क्यों ह्रदय से लगाता है ?
बहुत रो लिया 
बहुत विश्राम कर लिया 
अब उठ खडा हो जा
कर्म पथ पर चल
इक दिन
तूँ भी सफल होगा
तेरा भी भाग्योदय होगा
सूर्य सा चमकेगा
हिम्मत ना हार
जीवन जैसा भी आये
गले लगाता चल
निरंतर 
आगे बढ़ता चल
बिना रुके 
तूँ चलता चल
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-09-2011
1494-66-09-११

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  2. साकारात्मक सोच से ओतप्रोत सुन्दर रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  3. अब उठ खडा हो जा
    कर्म अपना करता चल
    इक दिन तूँ भी सफल होगा
    भाग्य तेरा भी उदय होगा
    सूर्य सा चमकेगा
    हिम्मत ना हार
    जीवन जैसा भी आये
    गले लगाता चल
    निरंतर आगे बढ़ता चल
    बिना रुके तूँ चलता चलइस सुन्दर प्रस्तुति के लिए जो जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाने की क्षमता पिरोये है बधाई ..http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/2011/09/blog-post_13.हटमल

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  4. अत्यंत सुन्दर .... प्रेरणादायक ...... आपको इस को अनुभूति के मंच पर भी देना चाहिए

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