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गुरुवार, 1 सितंबर 2011

मुरझाये फूल को ठोकर ना मारो

मुरझाये फूल को
ठोकर ना मारो
इस तरह नफरत
ना करो
कभी निरंतर
महकता था
भंवरों को लुभाता था
गुलशन की शान
बढाता था
वक़्त की मार से
झुलस गया है
वक़्त ने कब किसे
छोड़ा है
वक़्त तुम्हारा भी
बदलेगा
इक दिन तुम्हें भी
मुरझाना होगा
उस वक़्त का अहसास
कर लो
थोड़ी सी इज्ज़त
बक्श  दो
थोड़ा सा प्यार दे दो
मिट्टी में दफना दो
01-09-2011
1430-05-09-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. निस्संदेह ऐसे लोग प्रेरणा स्त्रोत बन जाते है!
    आभार आपका इसे प्रस्‍तुत करने के लिए।

    ‘ब्लॉगर्स मीट वीकली 6‘

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