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शनिवार, 10 सितंबर 2011

नेता मालामाल को कंगाल कर जाते हैं (हास्य कविता)



 निरंतर हंसने वाले
हँसमुखजी कौने में बैठ कर
आंसू बहा रहे थे
उनसे इस तरह रोने का
कारण पूछा
थोड़ी ना नकुर के बाद
वो कहने लगे
मेरे एकलौते कमाऊँ पुत्र को
एक घाघ नेता की लडकी ने
अपने जाल में फंसा लिया है
दोनों ने शादी का
निर्णय भी कर लिया  है
पहले तो सोचता था
पुत्र की शादी में ढेर सारा
दहेज़ मिलेगा
घर और ज्यादा संपन्न होगा
पर अब खुद के माल को
बचाने के लाले पड रहे हैं
नेता मालामाल को
कंगाल कर जाते हैं
देश का माल डकार जाते हैं 
सगे भाई को नहीं छोड़ते  हैं
मेरा माल क्या छोड़ेंगे
इस डर से घबरा रहा हूँ
10-09-2011
1480-52--09-11

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