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मंगलवार, 6 सितंबर 2011

प्रेम की चादर ओढने से पहले ही छिन गयी

मुलाक़ात हुयी
चंद बातें हुयी 
मन में आशा जगी
सपनों की दुनिया
अच्छी लगने लगी
निरंतरयाद
सताने लगी
हसरतें ऊँचाइयाँ
छूने लगी  
इंतज़ार की आदत
हो गयी
मिलना रोज़ होने
लगा
वादों का ढेर लग
गया 
मंजिल तक
पहुँचने से पहले
उन्होंने
दिल को दहलाया
इशारे से बताया
मंजिल
मिलना मुमकिन नहीं
उनकी मजबूरी है
किसी और के साथ
रस्म  निभानी है
उम्मीद की किश्ती
सदा की तरह
किनारे से पहले ही
डगमगाने लगी
बेवफाई के भंवर में
डूब गयी
प्रेम की चादर
ओढने से पहले ही
छिन गयी
06-09-2011
1457-29-09-11

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