ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

सोमवार, 5 सितंबर 2011

हँसमुखजी के दिल में आशिकी का भूत सवार हो गया

उसका 
पलट कर देखना
फिर मुस्काराना क्या हुआ
हँसमुखजी के दिल में
आशिकी का भूत सवार
हो गया
दिन रात उसको सपनों में
देखना शुरू कर दिया
निरंतर ख़त पर ख़त
लिखना चालु हो गया
पर  जवाब नहीं मिला
तंग हो कर एक दिन
उसके सामने खड़े हो गए
जवाब नहीं देने का
कारण पूछने लगे
कन्या बोली
अव्वल नंबर के
बेवकूफ और जाहिल हो 
मेरे मुस्काराने को तुमने
मोहब्बत का इज़हार
समझ लिया
पहली बार
बिना ताल मेल का
चेहरा देखा था
हर अंग जिसका एक
अजूबा था
इंसान तो इंसान
कुत्ते को भी हँसी आ जाए 
इस कारण हँसी थी
तुमने सोचा फँस गयी थी
अपनी गलती सुधार लो
सपने देखना बंद कर दो
नहीं तो टेढ़े मेढ़े चेहरे का
नक्शा बदल दूंगी
इंसान समझने की
गलती भी किसी से
नहीं होगी
05-09-2011
1450-22-09-11

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।
    --
    शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह ,क्या बात है ....बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं