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मंगलवार, 27 सितंबर 2011

भीड़ से घिरा हूँ

भीड़   से   घिरा हूँ
फिर भी अकेला हूँ
साथ  में  हंसता हूँ
अकेले में  रोता  हूँ
चुपचाप  सहता हूँ
निरंतर खुश होने का
दिखावा    करता  हूँ
वक़्त से लड़ता हूँ
ज़ुबां बंद रखता हूँ
लिख कर कहता हूँ
मन में खुश होता हूँ
कल  के लिए खुद
को तैयार  करता हूँ
सुबह फिर भीड़ से
घिरा होता हूँ….. 
27-09-2011
1574-1405-,09-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...बधाई...

    उत्तर देंहटाएं