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रविवार, 4 सितंबर 2011

असमंजस के भँवर

असमंजस के  भँवर
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मन के समुद्र में
 असमंजस के  
भँवर आते रहते
शब्द मगर
मुंह से नहीं निकलते
व्यथा किस से कहें
सोचते रहते
किस पर विश्वाश करें
निरंतर सवालों से 
झूझते रहते
चुपचाप सहते रहते  
 दर्द का बोझ 
ढोते रहते 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर    
04-09-2011
1443-18-09-11

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