ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

टूटे हुए मंज़र

दिन भर 
इंतज़ार में
डूबे रहते
आँखों में हसरत के
टूटे हुए मंज़र होते
शाम तक बुझे हुए
चिराग सा दिखते
ग़मों के बोझ
सोने भी ना देते
रात भर सुबह का
इंतज़ार करते
यूँ ही ज़िन्दगी
तमाम करते
 डा.राजेंद्र तेला, निरंतर,
22-09-2011
1542-113-09-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. निराशावादी हँसना भूल जाता है और आशावादी भूलने के लिए हँसता है।
    रात के बाद ही सुबह आएगी और आएगी निश्चित ही...

    उत्तर देंहटाएं