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बुधवार, 14 सितंबर 2011

लोग जहर उगलते रहे ,हम खुशी से निगलते रहे

लोग जहर उगलते रहे  ,हम खुशी से निगलते रहे
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जब भी मुस्कराए
किसी की नज़र के
शिकार हो गए
दो कदम आगे बढाए
जालिमों ने कांटे
बिछा दिए
हम खामोशी से बैठ गए
खामोशी भी लोगों को
रास नहीं आई 
नए मसले खड़े कर दिए
बातों से जहर उगलते रहे
हम खुशी से निगलते रहे
निरंतर नफरत से
लड़ते लड़ते
हम हँसना भूल गए
जीने की चाहत में
हम फिर भी ना रोए
हिम्मत से सहते रहे
धीरे धीरे चलते रहे
उनकी तंगदिली पर
हँसते रहे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
14-09-2011
1504-76-09-11

5 टिप्‍पणियां:

  1. काला - काला कोबरा, जहर उगलता जाय |
    किन्तु निरंतर वह भला, निगले पूरा खाय ||
    क्षमा सहित ||

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  2. देखी रचना ताज़ी ताज़ी --
    भूल गया मैं कविताबाजी |
    चर्चा मंच बढाए हिम्मत-- -
    और जिता दे हारी बाजी |
    लेखक-कवि पाठक आलोचक
    आ जाओ अब राजी-राजी-
    क्षमा करें टिपियायें आकर
    छोड़-छाड़ अपनी नाराजी ||
    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह ...बहुत ही बढि़या शब्‍दों का संगम ।

    उत्तर देंहटाएं