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सोमवार, 5 सितंबर 2011

व्यंग्य-ईमानदारी की कीमत


व्यंग्य-ईमानदारी की कीमत 
ईमानदार निश्छल 
सच्चाई के उपासक
नेताजी के मरने की
खबर अखबार में छपी
मांगने वालों की भीड़
इकट्ठी हो गयी
घर की तलाशी में
फूटी कौड़ी भी नहीं मिली
लोगों को समझ आ गया
नेताजी ने इमानदारी की
भारी कीमत चुकाई थी
उनकी पत्नी  
उन्हें छोड़ गयी थी
बच्चों ने अलग गृहस्थी
बसा ली थी
इमानदारी से
जीने के लिए परिवार से
विछोह औरउधारी
मजबूरी थी
डा.राजेन्द्र तेला,निरंतर  
05-09-2011
1453-25-09-11

इमानदारी, कविता, नेताजी, व्यंग्य, book, 

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