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गुरुवार, 8 सितंबर 2011

सपने जब टूटने ही हैं

सपने जब टूटने ही हैं
क्यों ना मन पसंद
सपने ही देखूं

स्वछन्द आकाश में

उड़ता फिरूं

समुद्र की गहराईओं में

गोता लगाऊँ

पहाड़ों पर बादलों से

अठखेलियाँ करूँ
 

ब्रम्हांड के
हर ग्रह को देखूं

जो बिछड़ गए 

उनसे 
रोज़ मिलूँ
जिन्हें चाहता हूँ 
उनसे  दूर ना रहूँ 
निरंतर हँसू सबको
हँसाता रहूँ

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
08-09-2011
1463-35-09-11

5 टिप्‍पणियां:

  1. Kavita Prasad to me

    11:12 AM (5 minutes ago)

    Kal ke bhukamp ke baad to yahi lagta hai ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. अच्छी कविता है राजेन्द्र जी!
    सादर शार्दुला

    उत्तर देंहटाएं
  3. shashi purwar to me

    show details 4:04 PM (1 hour ago)

    bahut sundar .

    उत्तर देंहटाएं