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सोमवार, 29 अगस्त 2011

जीवन सत्य जानने दो

क्यों कहते  हो ?
तुम्हारे साथ चलूँ
जैसा कहो वैसा करूँ
जैसे तुम रोते रहे हो
वैसे मैं भी रोऊँ
मुझे अकेला छोड़ दो
अपने आप चलने दो
जीवन की चट्टानों से
टकराने दो 
ठोकर खा कर गिरने दो
अपने आप उठने दो
भँवर में फसने दो
तैर कर निकलने दो 
आत्मावलोकन करने दो
अपना रास्ता ढूँढने दो
निरंतर सहारा दे कर
निर्बल ना बनाओ
अपना
बल पहचानने दो
जीवन सत्य जानने दो
28-08-2011
1413-135-08-11

4 टिप्‍पणियां:

  1. .बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
    चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  3. jeevan ka satya ............. janana bahut jaroori hai .
    aapki kavita sab kuch kah gayi

    उत्तर देंहटाएं