ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

सब चले जा रहे हैं

सब चले जा रहे हैं

धीरे धीरे

आगे बढ़ रहे हैं

अपनी,अपनी

समस्याओं का बोझ

उठाये

कुछ चुपचाप सह रहे हैं

कुछ चिल्ला चिल्ला

कर कह रहे

किसी को पता नहीं

कहाँ जाना है ?

फिर भी चले जा रहे हैं

थक गए हैं

पर खुद को तरो ताज़ा

बता रहे हैं

अपनी तन्हाईयों में

जी रहे हैं

निरंतर आशाओं में

निराशा का उत्तर

ढूंढ रहे हैं

05-08-2011

1307-29-08-11

1 टिप्पणी:

  1. लोग तन्हाँ है...थके हैं... सह रहे हैं... फिर भी बढ़ रहे हैं... जब हम यह जानते हैं तो उनकी किसी भी बात का बुरा नहीं मानना चाहिए...फिर से याद कर लिया यह पाठ यहाँ ... शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं