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शनिवार, 13 अगस्त 2011

कभी कभी तनहा रहना भी ज़रूरी


कभी कभी तनहा
रहना भी ज़रूरी अकेले में अश्क
बहाना भी ज़रूरी खुद से बात
करना भी ज़रूरी निरंतर
ज़ज्बात ज़ाहिर
करना भी ज़रूरी चलते चलते रुकना भी ज़रूरी आगे बढना भी
ज़रूरी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
शायरी,
13-08-2011
1355-77-08-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. कोई कभी तन्हा कहाँ रह पाता है....सोचकर देखें तो कितना कुछ उथल-पुथल मची रहती हैं मन में फिर तन्हां होकर भी हम कहाँ तन्हां रह पाते हैं..
    बढ़िया रचना..
    रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनायें!

    उत्तर देंहटाएं