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शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

क्या कहूं?किससे कहूं ?

क्या कहूं?किससे कहूं ?
दर्द-ऐ-दिल
कौन समझेगा?
हकीकत कौन मानेगा?
मज़ाक में उड़ा देंगे
कसूर मेरा बता देंगे
चर्चा शहर में करेंगे
बदनामी से नवाजेंगे
व्यथा और बढ़ा देंगे
किस्मत वालों को
सुनने समझने
वाला मिलता है
दर्द  कम करता है
ऐसी किस्मत अगर पाता
यहाँ तक नहीं पहुंचता
किसी कंधे का सहारा
पहले ही मिल जाता  
क्यों ना खामोशी से
सहता रहूँ
ग़मों को पीता रहूँ
घुट घुट कर जीता रहूँ
अकेले में रोता रहूँ
दिखाने को हंसता रहूँ

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
19-08-2011
1383-105-08-11

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