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शनिवार, 20 अगस्त 2011

हँसमुखजी खुद कुंवारें थे , मगर हर विवाह में शामिल होते थे(हास्य कविता)

हँसमुखजी
खुद कुंवारें थे
मगर हर विवाह में
शामिल होते थे
बच्चों से घिरे रहते थे
एक विवाह समारोह में
बात-बेबात निरंतर
खुल कर हंस रहे थे
मैंने इस तरह हंसने का
कारण पूछा
उन्होंने जवाब दिया
लड़के का बाप भी
हँस रहा है
पत्नी के ज़ुल्मों से
पीड़ित है
अभी तक अकेले
रोता था
अब बेटे का साथ
मिलेगा
माँ हँस रही है
क्यों की
ज़ुल्म करने के लिए
पती और बहु दोनों होंगे
दुल्हे का आखिरी दिन है
हँसने का
कल से रोना पडेगा
इसलिए अंतिम बार
खुल कर हँस रहा है
दुल्हन को भी नखरे उठाने
ज़ुल्म ढाने के लिए पती
मिल गया है
बच्चे पैदा होंगे तो सास
सम्हालेगी
इसलिए हँस रही है
मैं इन सब को देख कर
हँस रहा हूँ
इनका परिवार बढेगा
बेटा,बेटी पैदा होंगे
उनके नखरे बर्दाश्त करेंगे
हर इच्छा पूरी करेंगे
सर पर चढ़ाएंगे,
फिर रोएंगे  
उनको भी शादी के
चक्कर में फंसाएंगे
वो भी दिखाने को हँसेंगे
असलियत में रोएंगे
मैंने शादी नहीं करी
हर बच्चे को अपना
समझता हूँ
सब को इकसार प्यार
करता हूँ
बच्चों का चहेता हूँ
निरंतर खुल कर
हंसता हूँ
20-08-2011
1387-109-08-11

1 टिप्पणी:

  1. जब से अपुन ने शादी की है, तो भैया

    हमने तो दूसरों की बर्बादी अरे नहीं शादी में जाना ही छोड दिया है?

    उत्तर देंहटाएं