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रविवार, 21 अगस्त 2011

ना मैं बदला ना मेरी फितरत बदली

ना मैं बदला
ना मेरी फितरत बदली
बदली तो मेरी
किस्मत बदली
सुनहरी धूप
मंद पड़ गयी
चमक ना जाने
कहाँ खो गयी
उम्र ढल गयी
थकान बढ़ गयी
जीवन की
सांझ आ गयी
डगर कम रह गयी
रात के इंतज़ार में
उदिग्नता बढ़ गयी
जीने की इच्छा
मगर कम नहीं हुई
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
21-08-2011
1391-113-08-11


बुढ़ापा,उम्र,वृद्धावस्था

5 टिप्‍पणियां:

  1. रात को तो आना है निश्चित गति से और चले भी जाना है ... जीवन की रात नहीं आनी चाहिए ... उम्दा लिखा है ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत उम्दा . जीवन तो ऐसा ही चलता है पर जीवन में आने वाला हर दिन नया और उम्मीद से भरा होता है..

    आपकी कविताये जीवन के बहुत करीब है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी रचना |
    इस नए ब्लॉग में पधारें |
    काव्य का संसार

    उत्तर देंहटाएं